पति के जुल्म से टूट चुकी शायरा ने सपने में भी नही सोचा था कि वह कभी तलाक के अभिशाप से सताई गई महिलाओं के लिए नजीर बनेगी। अपने खिलाफ हुए हक-ए-जोजियत के मुकदमें में स्टे लेने के लिए शायरा सुप्रीम कोर्ट गई थी, वकील बाला जी श्रीनिवासन ने उनकी दास्तां सुनने के बाद उन्हें तीन तलाक के खिलाफ याचिका दायर करने की सलाह दी।
शायरा ने श्रीनिवासन की सलाह पर अमल करते हुए इस मामले में पहली याचिका दो फरवरी 2016 में दायर की और नतीजा आज सबके सामने हैं। पति रिजवान के तीन तलाक के बाद शायरा ने काशीपुर के फैमिली कोर्ट में धारा 125 के तहत भरण पोषण का वाद दायर किया। अदालत से नोटिस मिलने पर पति ने उसके खिलाफ इलाहाबाद के परिवार न्यायालय में हक-ए-जोजियत का मुकदमा दर्ज करा दिया।
शायरा के परिजनों ने अपने अधिवक्ता गोपाल कृष्ण एडवोकेट से संपर्क किया तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से स्टे लेने की बात कही। शायरा इस फैसले के खिलाफ स्टे लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। वहां पर उसने अपने अधिवक्ता बालाजी श्री निवासन को अपनी दुखभरी कहानी सुनाई।
अधिवक्ता ने तीन तलाक को घोर अमानवीय और असंवैधानिक मानते हुए इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की सलाह दी। शायरा बताती है कि अधिवक्ता श्री निवासन ने उसकी ओर से याचिका दायर करने के साथ ही कानूनी सहायता उपलब्ध कराई। यह मामला मीडिया की सुर्खियां बना तो तीन तलाक को लेकर एक के बाद एक कई याचिकाएं दायर हो गई। यह मुद्दा इतना उछला कि सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन करना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हूं और इस फैसले का समर्थन करती हूं। इस फैसले से देश की उन मुस्लिम महिलाओं में अपने अधिकार को लेकर आशा की किरन चमकी है, जिन्हें सामाजिक रूढ़िवादिता के चलते धार्मिक आडंबर के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने का अवसर नही मिल पाता था। मैं इस फैसले से उत्साहित हूं। आगे भी महिलाओं के हक में लड़ाई जारी रखूंगी।
-शायरा बानों, ट्रिपल तलाक के खिलाफ याचिकाकर्ता।