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इस गांव में अचानक पहुंचे अभिनेता रणदीप हुड्डा, लोगों ने पहचाना ही नहीं, पीछे है ये वजह

Sun, 08 Jul 2018 05:45 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रामनगर (नैनीताल)
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चोपड़ा गांव में रणदीप हुड्डा
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फिल्म अभिनेता रणदीप हुड्डा एक कार्यशाला में प्रतिभाग करने शनिवार को मुंबई से यहां पहुंचे। वह राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के टाइगर एंबेसडर भी हैं। इसलिए वह वन ग्राम लेटी, चोपड़ा पहुंचे। ग्रामीणों ने उन्हें पहचानने से इनकार किया तो हुड्डा थोड़े असहज से दिखे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि वन संरक्षण अधिनियम की बाधा के कारण गांव में बिजली, टीवी, सड़क आदि मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। 

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हुड्डा ने स्थानीय ग्रामीणों का रहन-सहन देखा और ग्रामीणों से उनकी समस्याओं के बारे में भी जानकारियां ली। उनके साथ गए ग्राम सभा ढिकुली के ग्राम प्रधान इकबाल ने ग्रामीणों को उनका परिचय दिया। उन्होंने ग्रामीणों को बताया कि जो चीजें तुम्हें मुफ्त में मिल रही हैं, उन चीजों के लिए मुझे मुंबई में कई हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। बिजली होगी तो टीवी दिखोगे और निकम्मे हो जाओगे।

उन्होंने ग्रामीणों के शौचालयों से लेकर हर चीज देखी। कई अच्छे मकानों पर टिनशेड देखकर वह ग्रामीणों से बोले कि भौतिक सुख, सुविधाओं की ओर मत बढ़ो। मीडिया से हुई सूक्ष्म वार्ता में उन्होंने बताया कि जंगलों के बीच से राष्ट्रीय राजमार्ग होना गलत है। इससे पोचिंग, सड़क दुर्घटनाओं समेत कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं। वहां का वातावरण खराब हो सकता हैं। कार्यक्रम के बाद वह स्थानीय प्राकृतिक सौंदर्य देखने के लिए कॉर्बेट लैंडस्केप में घूमने चले गए।

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हुड्डा ने जंगल में टाईगर नहीं देखा 

रणदीप ने गांव वालों से खूब बातें की
फिल्म अभिनेता रणदीप हुड्डा ने कार्यक्रम के समापन सत्र में बताया कि उन्होंने कई फिल्मों में काम किया है। देशभर के अधिकतर टाइगर रिजर्व देखे हैं लेकिन खुले जंगल में घूमता बाघ कभी नहीं देखा। इसके बावजूद मिट्टी पर उभरे पदचिह्न देखकर बता सकता हूं कि यह नर का है या मादा का। 

हुड्डा ने बताया कि उन्होंने क्षेत्र के किसी भी गांव या रिसॉर्ट स्थानीय संस्कृति नहीं देखी। उन्होंने राजस्थान का जिक्र करते हुए बताया कि राजस्थान में राजस्थानी खाना, नाच-गाने होते हैं। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। पर्यटकों को भी आनंद आता है। पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति को भी जानने का अवसर मिलता है लेकिन यहां ऐसा न होना चिंताजनक है।

उन्होंने कहा कि यहां के पर्यटन कारोबारियों को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा स्थानीय ग्राम सभाओं को भी देना चाहिए ताकि गांव में विकास कार्य होगा तो स्थानीय लोग भी पर्यटन से जुड़ेंगे। बताया कि नदियां भी प्रदूषित की जा चुकी हैं। बाघ बचाओ के संदेश को नाकाफी बताते हुए उन्होंने कहा कि आप खुद को बदलें। अगर हम सभी अपनी जिम्मेदारी निभाने लगें तो बाघ स्वयं ही बढ़ जाएंगे क्योंकि रिसॉर्ट, होटलों से ध्वनि प्रदूषण की आवाज जंगलों तक पहुंचती है, जिसका वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं और जिन वन्यजीवों को देखने के लिए पर्यटक आ रहे हैं, उनके दर्शन तो दूर उनकी आवाज तक नहीं सुनाई पड़ रही।

उन्होंने चोपड़ा गांव का भी जिक्र किया। कहा कि उस गांव के लोग घने जंगल के बीच बिना बिजली के रहते हैं और वहां मानव वन्यजीव संघर्ष भी नहीं हुआ। सिर्फ बाघ न दिखने से निराश पर्यटकों की मानसिकता को भी उन्होंने गलत बताया जो यहां की व्यापक जैवविविधता को नहीं समझ, बता पाते। 
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