रणदीप ने गांव वालों से खूब बातें की
फिल्म अभिनेता रणदीप हुड्डा ने कार्यक्रम के समापन सत्र में बताया कि उन्होंने कई फिल्मों में काम किया है। देशभर के अधिकतर टाइगर रिजर्व देखे हैं लेकिन खुले जंगल में घूमता बाघ कभी नहीं देखा। इसके बावजूद मिट्टी पर उभरे पदचिह्न देखकर बता सकता हूं कि यह नर का है या मादा का।
हुड्डा ने बताया कि उन्होंने क्षेत्र के किसी भी गांव या रिसॉर्ट स्थानीय संस्कृति नहीं देखी। उन्होंने राजस्थान का जिक्र करते हुए बताया कि राजस्थान में राजस्थानी खाना, नाच-गाने होते हैं। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। पर्यटकों को भी आनंद आता है। पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति को भी जानने का अवसर मिलता है लेकिन यहां ऐसा न होना चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि यहां के पर्यटन कारोबारियों को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा स्थानीय ग्राम सभाओं को भी देना चाहिए ताकि गांव में विकास कार्य होगा तो स्थानीय लोग भी पर्यटन से जुड़ेंगे। बताया कि नदियां भी प्रदूषित की जा चुकी हैं। बाघ बचाओ के संदेश को नाकाफी बताते हुए उन्होंने कहा कि आप खुद को बदलें। अगर हम सभी अपनी जिम्मेदारी निभाने लगें तो बाघ स्वयं ही बढ़ जाएंगे क्योंकि रिसॉर्ट, होटलों से ध्वनि प्रदूषण की आवाज जंगलों तक पहुंचती है, जिसका वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं और जिन वन्यजीवों को देखने के लिए पर्यटक आ रहे हैं, उनके दर्शन तो दूर उनकी आवाज तक नहीं सुनाई पड़ रही।
उन्होंने चोपड़ा गांव का भी जिक्र किया। कहा कि उस गांव के लोग घने जंगल के बीच बिना बिजली के रहते हैं और वहां मानव वन्यजीव संघर्ष भी नहीं हुआ। सिर्फ बाघ न दिखने से निराश पर्यटकों की मानसिकता को भी उन्होंने गलत बताया जो यहां की व्यापक जैवविविधता को नहीं समझ, बता पाते।