यह तो कांग्रेस, पीडीएफ दोनों को मालूम है कि राज्यसभा प्रत्याशी मामले में आखिरकार पीडीएफ को मान जाना है, लेकिन दबाव को ठीक से भुनाकर।
पीडीएफ की कुल ताकत छह सदस्यों की है जो कि राज्यसभा चुनाव में तब तक कोई मायने नहीं रखती, जब तक कि कोई बड़ी ताकत साथ न हो। पीडीएफ का मकसद आखिरी साल में अपना भविष्य सुरक्षित करना भी है।
विधानसभा चुनाव में अब कुछ महीनों का वक्त ही बचा है। पीडीएफ के तीन सदस्य मंत्री प्रसाद नैथानी, हरीशचंद्र दुर्गापाल, दिनेश धनै कांग्रेस से बगावत कर चुनाव लड़े। जीतने के बाद इन लोगों ने कांग्रेस को समर्थन देने की एवज में मंत्री पद हासिल किया था।
दिनेश धनै कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय को टिहरी सीट से मात्र 377 मतों से हराकर विधानसभा में पहुंचे थे। यह तीनों अब कांग्रेस से अपना टिकट पक्का कर लेना चाहते हैं।
पीडीएफ के चौथे सदस्य प्रीतम सिंह पंवार यमुनोत्री सीट से यूकेडी के टिकट पर जीतकर कांग्रेस को समर्थन देकर मंत्री बने थे। अन्य दो सदस्य सरवत करीम अंसारी, हरिदास बसपा से जीते थे। इनको मंत्री बनाने के लिए मायावती की मंजूरी जरूरी है, लेकिन अन्य किसी तरीके से इन्हें लाभ पहुंचाया जा सकता है।
कांग्रेस के रणनीतिकार जानते हैं कि पीडीएफ राज्यसभा सीट के लिए भाजपा का समर्थन नहीं लेगा, क्योंकि इससे कांग्रेस से रिश्ते तल्ख हो जाने का खतरा है। यह कई मामलों में पीडीएफ को भारी पड़ जाएगा।
इसके अलावा फ्लोर टेस्ट में पास हो जाने के बाद हरीश रावत सरकार छह माह के लिए सुरक्षित हो चुकी है। इस अवधि के बाद यदि सरकार गिर भी जाए, तो कार्यवाहक सरकार के रूप में चुनाव कराने का पूरा मौका उसके हाथ में होगा।