दूरस्थ गांव में पले और दुर्गम स्कूल में पढ़े शैलेंद्र नेगी के लिए यह खबर सपना सच होने जैसी थी। शैलेंद्र ने उत्तराखंड पीसीएस परीक्षा 2010 में टॉप किया है। इन दिनों नंदा राजजात यात्रा में गए शैलेंद्र को अमर उजाला ने टॉपर बनने की जानकारी दी तो उन्होंने इस कामयाबी को मां नंदा का आशीर्वाद बताया।
मूलत: सिकुलीखाल, पौड़ी गढ़वाल और हाल निवासी देहरादून के उन्नति विहार निवासी शैलेंद्र नेगी की पढ़ाई गांव के ही प्राथमिक विद्यालय और इंटर कॉलेज से हुई। जीआईसी दुवाधार में अंग्रेजी प्रवक्ता शैलेंद्र नेगी इन दिनों डेपुटेशन पर दून में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (रमसा) में समन्वयक पद पर तैनात हैं।
2002 और 2004 में प्री से हुए थे बाहर
शैलेंद्र ने बताया कि शिक्षक बनने के बाद भी उन्होंने पीसीएस अफसर बनने का सपना पूरा करने के लिए मेहनत जारी रखी। वर्ष 2002 और वर्ष 2004 में प्री परीक्षा में ही बाहर हो गए। वर्ष 2006 में मेंस में कामयाब नहीं हो सके। वर्ष 2010 में शैलेंद्र ने फिर पीसीएस परीक्षा दी और सफलता उनसे इस बार दूर न रह सकी।
जज्बे को मिला पत्नी और परिवार का सहारा
पत्नी, माता-पिता, दो बच्चों का परिवार और सुबह दस से शाम पांच तक की नौकरी। थकान कई बार हावी होती थी, लेकिन शैलेंद्र के कदम लक्ष्य से कभी डगमगाए नहीं। इसके पीछे शैलेंद्र का जज्बा तो था ही, उससे कहीं ज्यादा वह सहारा था जो उन्हें पत्नी प्रमिला और माता-पिता से मिला।
कामयाबी के रास्ते पर मजबूत कदम भरने में शैलेंद्र को जहां परिवार के साथ रहकर भी दूरी बनाए रखनी पड़ी, वहीं परिवार ने भी हमेशा उनके सपने को अपना समझ यह कुर्बानी खुशी से कबूली। 12 साल की कड़ी मेहनत का नतीजा आज सामने है।
पापा ने दिया फोन पर आशीर्वाद
शैलेंद्र के टॉपर बनने की खबर मिलते ही उनकी पत्नी प्रमिला खुशी से उछल पड़ी। वह तुरंत ससुर जगमोहन सिंह नेगी के पास पहुंची और यह खबर सुनाकर फोन थमा दिया। पिता ने भी तुरंत शैलेंद्र को फोन किया और कामयाबी आशीर्वाद दिया। नेगी ने बताया कि शैलेंद्र उनके पांच बच्चों में दूसरे नंबर के हैं।
बताया कि स्कूली दिनों से ही शैलेंद्र पढ़ाई के प्रति गंभीर रहे। उन्हें पूरा यकीन था कि बेटा एक दिन पीसीएस में कामयाब जरूर होगा। मां शाकंभरी देवी भी बेटे की कामयाबी पर बेहद खुश नजर आईं।
पति का सपना बना अपना
प्रमिला ने बताया कि नौ साल पहले उनकी शादी शैलेंद्र से हुई तब भी शैलेंद्र पीसीएस की तैयारी कर रहे थे। प्रमिला बताती हैं कि शैलेंद्र सुबह ठीक सात बजे कोचिंग के लिए निकल जाते थे। साढ़े नौ बजे कोचिंग से निकलते और दस बजे तक आफिस पहुंच जाते।
शाम को पांच बजे के बाद घर आते और फिर अपने बेडरूम में जाकर फिर किताबें खोल लेते। प्रमिला पूरा ध्यान रखती कि शैलेंद्र की पढ़ाई में दखल न हो।
पत्नी ने लिया इंटरव्यू
प्रमिला ने बताया कि मेन्स एग्जाम क्लियर कर लेने के बाद शैलेंद्र इंटरव्यू की तैयारी में जुटे तो उनकी मदद ली। प्रमिला ने ही पति का प्रीपेरेशन इंटरव्यू लिया। इसके बाद दोनों ने कई दिन तक अलग-अलग सवालों के बेहतर जवाब तैयार किए।
पापा अब खेलेंगे हमारे साथ
पापा शैलेंद्र जब ऑफिस से आते तो बेटी समृद्धि और बेटे श्रद्धेय नेगी उनके पास दौड़कर पहुंच जाते। दोनों पापा से साथ खेलने के लिए कहते, लेकिन शैलेंद्र चंद मिनट बाद ही कमरे में किताबें उठाकर बैठ जाते। बच्चे उदास होते तो मां और दादा-दादी उनका मन बहलाने लगते। पापा हमेशा यही जवाब देते, जिस दिन कामयाब हो गया, तुम्हारे साथ खूब खेलूंगा। आज बच्चों के चेहरों पर खुशी इसलिए खिल रही थी कि अब पापा उनके साथ खेलेंगे।
अभी भी पढ़ने का जज्बा है भरा
शैलेंद्र में पढ़ने का जज्बा इस कदर है कि अभी वह गढ़वाल विवि से एजूकेशन में पीएचडी कर रहे हैं। पिता जगमोहन सिंह नेगी ने बताया कि शैलेंद्र ने पीजी कालेज कोटद्वार से बीए, एमए और बीएड किया था। पीसीएस परीक्षा में उन्होंने प्री में पॉलिटिकल साइंस, जबकि मेन्स में पॉलिटिकल साइंस और सोशल वर्क विषय चुना था।
जागरूकता की है जरूरत
शैलेंद्र ने फोन पर कहा कि उत्तराखंड के युवाओं में आज भी जागरूकता का अभाव है। बताया कि वह खुद 38 साल की उम्र में पीसीएस बने। शिक्षक बनने के बाद उनकी समझ में आया कि वह इस परीक्षा की तैयारी कर सकते हैं।
बताया कि इसके पीछे एक बड़ी वजह उत्तराखंड में विशेषज्ञों की कमी भी है। अच्छी कोचिंग के लिए युवाओं को दिल्ली का रुख करना पड़ता है। शैलेंद्र ने बताया कि उन्होंने दून के प्रयाग आईएएस एकेडमी से दो साल तक कोचिंग की। उन्होंने कहा कि संस्थान से मिली गाइडेंस उनकी कामयाबी में अहम रही।
(नोटः इस खबर से संबंधित किसी भी सुझाव या सवाल के लिए मेल आईडी-aftaba@ddn.amarujala.com और इस नंबर-8392922180 पर संपर्क कर सकते हैं।)