हरिद्वार के लक्सर निवासी 30 वर्षीय सुनील (बदला हुआ नाम) ट्यूबरक्लोसिस की गंभीर स्थिति में है। उसे अपना काम भी छोड़ना पड़ा।
सरकारी अस्पतालों के दवा खाने खाली होने के कारण 15 हजार रुपये प्रति महीने की दवा बाजार से खरीदनी पड़ रही है। पत्नी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर किसी तरह घर का खर्चा चला रही है।
सुनील की तरह ही बहुत ऐसे मरीज हैं जिन्हें टीबी की दवाएं सरकारी अस्पतालों से नहीं मिल रही हैं। अधिकारी कहते हैं कि जिला स्तर से लगातार शासन को रिपोर्ट भेजी जा रही हैं फिर भी दवाखाने खाली हैं।
प्रदेश में दो साल पहले टीबी के एमडीआर (मल्टी ड्रग रेसिसटेंस) के मरीजों की पुष्टि हुई थी। एमडीआर के साथ ही एक्सडीआर (एक्सट्रीमली ड्रग रेसिसटेंस) के मरीजों की दवाएं भी सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कराई जाती हैं लेकिन हकीकत यह है कि एमडीआर के मरीजों की दवाएं तो हैं, एक्सडीआर के मरीजों को दवाएं नहीं मिल पा रही हैं।
जिंदा रहने के लिए मरीज बाजार से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं।
अस्पताल में एक्सडीआर मरीजों के लिए दवाएं नहीं हैं। कई बार शासन को लिखा जा चुका है।
- डा. मनोज कुमार, जिला क्षय रोग अधिकारी
क्या है एक्सडीआर टीबी
टीबी के मरीज यदि दवा छोड़ दें तो बैक्टीरिया ज्यादा सक्रिय हो जाता है। जब सामान्य टीबी की दवाएं काम करना बंद कर देती हैं तो उस मरीज को एमडीआर (मल्टी ड्रग रेसिस्टेंस टीबी) की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
इस श्रेणी की दवाएं भी रोग न काटें तो जांच के बाद उसे एक्सडीआर (एक्सट्रीमली ड्रग रेसिस्टेंस) श्रेणी में रखा जाता है। एक्सडीआर टीबी की अंतिम स्टेज है। इसमें मरीज का बच पाना मुश्किल होता है। खतरे की बात यह है कि एक्सडीआर के मरीजों से इसी श्रेणी की टीबी का संक्रमण होता है।
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