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'सेना ने मुझे बनाया परमवीर लायक'

Sat, 16 Aug 2014 10:28 AM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून
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सेना ने मुझे इस काबिल बनाया कि आज मेरे सीने पर वीरता का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र सजा है। यह मानना है कारगिल युद्ध में दुश्मनों को उनके बंकर में मौत के घाट उतारने वाले जांबाज नायब सुबेदार संजय कुमार का।
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हरा पाना नामुमकिन
संजय मानते है कि सेना एकमात्र संस्थान है जहां एकजुटता, सहयोग, प्रोत्साहन, लीडरशिप और जांबाजी का जज्बा सर्वाधिक है। दुश्मन को हर मोर्चे पर ढेर करने में भारतीय सेना के अफसर हो या अन्य रैंक उस टीम की तरह है जिसे हरा पाना नामुमकिन है। संजय अपने सम्मान में कारगिल युद्ध लड़े सैनिकों और शहीदों को बराबर का हिस्सेदार मानते है।

भारतीय सैन्य अकादमी में बतौर इंस्ट्र्क्टर तैनात नायब सूबेदार संजय ने कारगिल युद्ध के उन दिनों को याद करते हुए बताया कि दुश्मन के हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए वहां किसी भारतीय सैनिक को जान की परवाह नहीं थी। सैनिकों के बुलंद हौसले के साथ अफसरों की जोरदार रणनीति के बूते बेहद मुश्किल हालात में दुश्मन को बाहर खदेड़ा।
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वीरता की मिसाल कायम की महज 24 बरस की उम्र में राइफलमैन संजय कुमार ने सैन्य इतिहास में वीरता की वह मिसाल कायम की जिसका सपना हर सैनिक के दिल में होता है। संजय मानते हैं कि फौज ही एक ऐसी संस्था है जिसमें सबके लिए समान अवसर है।

सीनियर जूनियर के बीच एक परिवारिक रिश्ता है जो सीखने और आगे बढ़ने के ऐसे अवसर प्रदान करता है। आज में जहां जिस मुकाम पर खड़ा हूं वह सेना की ही देन है। सेना में 19 बरस गुजारने के बाद नायब सूबेदार संजय महसूस करते हैं कि सेना में आने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई। संजय हिमाचल प्रदेश हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जनपद के रहने वाले हैं।

ब्रेवेस्ट ऑफ द ब्रेव
संजय 13 जैक राइफल्स के हैं जिसके रणबांकुरों ने कारगिल में दुश्मन पर कहर बरपाया था। रेजिमेंट ने कारगिल युद्ध में प्वाइंट 4750, 4875 और 5140 को फतेह किया। यह पहली रेजिमेंट है जिसके दो परमवीर चक्र का सम्मान मिला। संजय के अलावा कैप्टन विक्रम बतरा को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया। इसके अलावा रेजिमेंट इस युद्ध में सात वीर चक्र मिले। वीरता की इस मिसल के लिए रेजिमेंट को ब्रेवेस्ट आफ द ब्रेव का टाइटल नवाजा गया है।

सेना पेशा नहीं जज्बा है
नायब सूबेदार संजय कुमार युवाओं के बीच सेना के प्रति आकर्षण बढ़ाने के लिए हर वर्ष हाईस्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच जाते हैं। संजय का कहना है कि आजकल युवा बेहद समझदार हैं उनको सिर्फ हल्के से मार्गदर्शन की जरूरत है। आज तक मैं जिन शिक्षण संस्थानों में गया वहां से कुछ बरस बाद लिये फीडबैक से पता चलता है कि युवा की सेना ज्वाइन करने की संख्या बढ़ी है। इसके अलावा एनडीए, आईएमए और ओटीए के कैडेट्स को भी संजय मोटिवेशनल लेक्चर देते हैं।

अगर काबलियत है तो अवसर को कमी नहीं
सेना में आगे बढ़ने के तमाम अवसर मौजूद हैं। बतौर जवान भर्ती होने वाले के लिए अफसर बनने की काबलियत है तो उसकी यूनिट के अफसर उसे प्रोत्साहित करते हैं। जहां पहले ज्यादा पढ़े लिखे जवान नहीं आते थे अब ऐसा नहीं है। पढ़े लिखे युवा सेना में जवान भर्ती होकर बाद में अफसर बन रहे हैं।
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