उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था बेहद बदहाल है, लेकिन इस सबके बीच पिथौरागढ़ जिले में अभिभावकों ने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए अनोखी पहल की है।
यहां सरकारी स्कूलों पर निर्भर अभिभावकों ने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद के खर्च पर अध्यापक रखे हैं। फिर चाहे वह पिथौरागढ़ जिले में थल का राजकीय इंटर कॉलेज हो या डीडीहाट जीआईसी। इन दोनों स्कूलों में अभिभावकों ने अंग्रेजी और रसायन विज्ञान पढ़ाने के लिए संबंधित विषय के शिक्षित बेरोजगार युवकों को रखा है जिनका वेतन अभिभावक वहन करते हैं।
शिक्षकों के अभाव में राजकीय इंटर कॉलेज डीडीहाट में छात्रों की संख्या घटकर 309 पहुंच गई है। कभी इस विद्यालय में 1500 विद्यार्थी पढ़ते थे। कक्षा आठ में मात्र 12 बच्चे रह गए हैं।
स्कूल में न तो अंग्रेजी का टीचर है और न ही रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान का। हालांकि विद्यालय में शिक्षकों के 19 पद सृजित हैं, लेकिन महत्वपूर्ण विषयों के नौ पद खाली चल रहे हैं। हाल के वर्षों में विद्यालय से एक-एक कर शिक्षकों के तबादले हो गए और उनकी जगह कोई नहीं आया।
शिक्षकों को दे रहे ढाई-तीन हजार रुपए माहवार
लंबे समय तक जब शिक्षकों को तैनाती नहीं हुई तो अभिभावकों को बच्चों को पढ़ाने के लिए अपने खर्च पर दो शिक्षक रखवाने पड़ गए। इनमें से एक शिक्षक रसायन विज्ञान और बायोलॉजी पढ़ाता है जबकि दूसरा अंग्रेजी। अभिभावकों की ओर से इन शिक्षकों को ढाई-तीन हजार रुपए माहवार दिए जाते हैं।
विद्यालय में हिंदी, अर्थशास्त्र, इतिहास और समाजशास्त्र पढ़ाने वाले लेक्चरर भी नहीं हैं। एलटी ग्रेड में भी कई पद रिक्त हैं। प्रधानाचार्य की व्यवस्था प्रभारी पर छोड़ी गई है। पहले गांव घरों के विद्यार्थी डीडीहाट पढ़ने आते थे, लेकिन अब डीडीहाट के बच्चे खुद ही अन्य विद्यालयों में प्रवेश लेने को बाध्य है।
मानक के अनुसार तैनात हों शिक्षक
राज्य आंदोलनकारी जोध सिंह बोरा का कहना है कि विद्यालयों में मानक के हिसाब से शिक्षक तैनात होने चाहिए।
सरकार तबादला नीति तो बनाती है, लेकिन इन तबादलों के बाद विद्यालय शिक्षकविहीन तो नहीं हो रहे इसका ध्यान देना चाहिए। ऐसी नीति की जरूरत क्या है जो शिक्षा को ही चौपट कर रही हो।
ऐसे तो चौपट हो जाएगी सरकारी शिक्षा
शिक्षाविद और जीआईसी डीडीहाट के पूर्व प्राचार्य डीएस पांगती का कहना है कि जिस तरह का सिस्टम अब बन गया है, उससे तो लगता है कि आने वाले समय में सरकारी शिक्षा चौपट हो जाएगी।
सरकार एक ऐसी नीति तैयार करे, जिससे स्कूलों में व्यवस्था खराब न हो। पठन-पाठन का माहौल बना रहे।