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सांप छोड़ पेंगोलिन के पीछे क्यों पड़े सपेरे?

Thu, 05 Jun 2014 12:09 AM IST
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
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दिखने में खूबसूरत, लेकिन शर्मीले पेंगोलिन का अस्तित्व उत्तराखंड में खतरे में है। राज्य के जंगलों में सबसे ज्यादा शिकार इसी वन्यजीव का हो रहा है।
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पांच साल में पेंगोलिन के चार क्विंटल खोल पकड़ा जाना इसकी तस्दीक करता है। पेंगोलिन शांत स्वभाव का वन्यजीव है, जो चींटी खाता है।

चींटियों की बांबी के पास रहने वाले इस जानवर की तलाश में शिकारियों को मुश्किल नहीं होती। इसके अलावा इसे मारने के लिए उन्हें खास हथियार भी नहीं ले जाने पड़ते हैं।

छूने या खतरे का आभास होने पर पेंगोलिन खुद को शल्कों (खोल) में समेटकर फुटबाल की तरह गोल हो जाता है। इसके बाद वह देख ही नहीं पाता कि उस पर हमला किया जा रहा है। शिकारी आसानी से उसे पीट-पीटकर मार डालते हैं।
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चीन में है सबसे ज्यादा मांग

सूत्र बताते हैं कि प्रदेशभर में पेंगोलिन की बड़ी संख्या मौजूद है, लेकिन वन विभाग ने आज तक न तो इनकी संख्या मालूम करने के लिए सर्वे किया है न ही इनकी सुरक्षा की कोई योजना बनी है।

ऐसे में शिकारियों के लिए यह आसान शिकार बन जाता है। बदिया सपेरा प्रजाति के लोग पेंगोलिन का सबसे अधिक शिकार करते हैं।

उनके लिए यह भोजन का जरिया बनता है, जबकि इससे मिलने वाले खोलों का व्यापार बावरिया गिरोह करता है। बदिया प्रजाति के लोगों में पहले पेंगोलिन के खोल से कुंडल बनाने की परंपरा थी।

इस प्रजाति के बुजुर्गों के कानों में आज भी ऐसे कुंडल दिखते हैं।

विभागीय सूत्र बताते हैं कि पेंगोलिन के खोलों की मांग चीन में सबसे अधिक है। वहां की चिकित्सा पद्धति में इनका प्रयोग किया जाता है।

चीन की शह पर पूर्वोत्तर राज्यों में पाए जाने वाले चाइनीज पेंगोलिन का इस कदर शिकार किया गया कि यह विलुप्ति के कगार पर आ गया। इसके बाद अब भारतीय प्रजाति के पेंगोलिनों का शिकार किया जाने लगा है।

गारमेंट्स मार्केट में भी पेंगोलिन के खोल की मांग

दवाएं बनाने के अलावा गारमेंट्स मार्केट में भी पेंगोलिन के खोल की मांग रहती है। इन खोलों की मदद से खास कोट बनाए जाते हैं। एक पेंगोलिन से चार किलो तक खोल मिल जाते हैं।

लगातार बढ़ रही मांग ने इन खोलों की कीमत भी बढ़ा दी है। पिछले साल तक इसका बाजार भाव करीब सात हजार रुपए प्रति किलो था, जो अब 25 हजार रुपए हो गया है।

सूत्र बताते हैं कि उत्तराखंड के अलावा हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में भी पेंगोलिन का शिकार हो रहा है।

पेंगोलिन का शिकार रोकने के लिए नई रणनीति बनाई जा रही है। हमारी टीम लगातार इस पर निगाहें रखे हुए है। जल्द ही कुछ सख्त कदम उठाए जाएंगे।
- एके दत्ता, हेड, एंटी पोचिंग टीम
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राजाजी पार्क में धरे दो शिकारी

राजाजी राष्ट्रीय पार्क को टाइगर रिजर्व घोषित करने की कवायद के बीच शिकारियों की दस्तक ने वन विभाग और पार्क प्रशासन के कान खड़े कर दिए हैं।

पांच दिन पूर्व पार्क प्रशासन ने दो शिकारियों को पकड़ा है, जिनके पास से पेंगोलिन के खोल और खटके बरामद हुए हैं। इसके बाद पार्क में चौकसी बढ़ा दी गई है।

पार्क सूत्रों ने बताया कि 28 मई की शाम 04:30 बजे गश्त के दौरान पार्क के घोलना कंपार्टमेंट में एक शिकारी दबोचा गया। उसका नाम मुकेशनाथ पुत्र हरिनाथ निवासी भानियावाला है।

उसके पास से पेंगोलिन के खोल बरामद किए गए हैं। इसके अलावा साझानाथ पुत्र कालानाथ निवासी हरिपुर कलां को हरिद्वार के चंडी पुल से शाम छह बजे पकड़ा गया। उसे गौहरी रेंज के दुगड्डा में देखा गया था।
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