जौनसार बावर में मंगलवार को औंस पर्व के साथ ही बूढ़ी दिवाली का आगाज हो गया। शाम ढलते ही पंचायती आंगन में लोक संस्कृति की छटा बिखर गई। घरों में लजीज व्यंजन पकाए गए। पंचायती आंगन में लोक कलाकारों ने देर रात तक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।
ढोल-दमाऊ की थाप पर लोगों ने जमकर नृत्य किया। क्षेत्र के सिलगांव, सिलीगोथान, मंजियारना, विशायल, पशगांव, अठगांव, लखवाड़, लाखामंडल, भरम, बाना, पंचगांव, उप्पल गांव, कोरू खत, बहलाड़, तपलाड़ समेत क्षेत्र के कई खतों में यह पर्व मनाया गया। ढोल-दमाऊ की थाप पर लोगों ने सुबह पंचायत स्थान पर होल्ला (भिमल की मशाल) लेकर नृत्य किया। सुबह से ही लोगों ने मंदिरों में जाकर देव स्तुति कर सुख और समृद्धि की कामना की। इसके बाद पंचायती आंगन में रात भर लोगों ने ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य किया। बाजारों में खासा चहल-पहल देखी गई। घर जाने के लिए वाहनों में भी खासा भीड़ रही। वाहन कम होने के चलते लोगों को छोटे वाहनों में ओवरलोड होकर सफर करना पड़ा।
बुधवार को क्षेत्र में भिरुड़ी पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व की खासियत यह है कि यह दिवाली पूरी तरह से इको फ्रेंडली होती है। इसमें पटाखों का शोर नहीं होता। पर्व की शुरुआत से पूर्व लोगों ने घरों को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया।
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दो साल बाद पुरानी परपंरा पर लौटा बाना खत
साहिया। दो साल पूर्व बाना खत के लोगों ने पुरानी रीती-रिवाजों को छोड़ कर पूरी दुनिया के साथ कार्तिक शुक्ल पक्ष की अमावस्या को दिवाली बनाने की परंपरा शुरू की थी, लेकिन इस साल ग्रामीणों ने अपनी लोक संस्कृति की ओर लौटते हुए फिर से बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा की शुरुआत की है। खत के अंतर्गत पंजिया, लुंवाठा, अमराया, दधऊ, बनसार, चापनू गांव आते हैं। इन गांवों में इस साल बूढ़ी दिवाली का जश्न देखते ही बन रहा है।