बीती दो मार्च को जब लंबे समय से कैंसर से पीड़ित पवन कली ने अंतिम सांस ली तो अखाड़े के संत फूट फूटकर रोए। तीन पीढ़ियों से महावत के रूप में पवन कली की सेवा कर रहे टीपू और उनके बेटे अब्बास जिस तरह भावुक नजर आए, वह इस बात को दर्शा रहा था कि मानव और वन्यजीव के बीच भी अपनत्व का रिश्ता किस हद तक हो सकता है।
शांति पाठ के दौरान महंत प्यारा सिंह, महंत अमनदीप सिंह महाराज, महंत सतनाम सिंह महंत गुरमीत सिंह, महंत प्रेमदास, महंत सतनाम सिंह, महंत श्यामप्रकाश, स्वामी ज्ञानानंद, स्वामी हरिहरानंद, स्वामी रविदेव शास्त्री, स्वामी दिनेशदास, महंत मोहन सिंह, महंत तीरथ सिंह, महंत सूरज दास, स्वामी अरुण दास मौजूद रहे।
पिछले चार कुंभ के हर पेशवाई की नुमाइंदगी करने वाली पवन कली को षोड़शी समारोह में जिस तरह से साध्वी के रूप में श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया, उसने हथिनी का सम्मान और भी बढ़ा दिया। अखाड़े के संतों ने उसे बचपन की तरह ही पाला और अखाड़े के नियमों के अनुरूप ही बड़ा किया। कुंभ के मेलों की पेशवाई हो या अखाड़े के अन्य आयोजनों के जुलूस, बड़े शान से पवन कली इन आयोजनों का हिस्सा होती थी। उसे दुल्हन की तरह सजने संवरने का शौक भी था, जो अखाड़े के संत बखूबी पूरा करते थे।
वन विभाग की भी रही मेहमान
एक दौर ऐसा भी आया जब पवन कली को वन विभाग के अधिकारी कानूनों का हवाला देकर अखाड़े से ले गए थे। महंत अमनदीप सिंह के अनुसार, वर्ष 2009 में वन्य जीवों को अपने यहां नहीं रखने का हवाला देते हुए वन विभाग के अधिकारी पवन कली को ले गए थे, लेकिन कानूनी लड़ाई लड़कर अखाड़े के संत पवन कली को वापस लाए।