हाईकोर्ट के फैसले के बाद बृहस्पतिवार को शाम होते-होते यह भी स्पष्ट हो गया कि पंचायत चुनावों को लेकर कुहासा छंटने की बजाय गहरा गया है। कोर्ट के फैसले के अनुरूप राज्य निर्वाचन आयोग ने देर शाम तक कोई दिशा निर्देश जारी नहीं किए, जबकि शुक्रवार से प्रथम चरण के नामांकन शुरू हैं। उधर, शासन ने भी अपनी तरफ से राज्य निर्वाचन आयोग से बात करने की पहल नहीं की। ऐसे में शुक्रवार को नामांकन कराने के लिए तैयार बैठे कई दावेदार यह भी तय नहीं कर पाएंगे कि वे नामांकन कराएं भी या नहीं। वहीं, दो से अधिक संतान वालों के सामने नामांकन कराने के बाद उसके निरस्त होने का खतरा रहेगा।
राज्य निर्वाचन आयोग के सूत्रों के मुताबिक देर शाम तक आयोग को विधिवत न तो हाईकोर्ट के फैसले की जानकारी मिली थी और न ही शासन से कोई बात हुई। ऐसे में आयोग की ओर से नामांकन को लेकर कोई अतिरिक्त दिशा निर्देश भी जारी नहीं किए गए। आयोग की ओर से दिशा निर्देश जारी न होने पर शुक्रवार को सभी जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारी पूर्व में जारी गाइडलाइन के आधार पर नामांकन स्वीकार करेंगे। ऐसे में दो से अधिक संतान वाले हजारों इच्छुकों के सामने संशय की स्थिति रहेगी। आयोग के एक उच्च पदस्थ अधिकारी के मुताबिक तरीका यही है कि सरकार आयोग को बताए कि यह संशोधन हुआ है और उसके बाद आयोग संशोधन के आधार पर जिला निर्वाचन अधिकारियों को दिशा निर्देश जारी करे। उधर, शासन भी इस मामले को लेकर दिन भर चुप्पी साधे बैठा रहा। देर शाम पंचायत सचिव रंजीत सिन्हा ने बताया कि आयोग से विचार विमर्श कर फैसला लिया जाएगा। शुक्रवार सुबह इस पर आयोग से बात होगी। शासन, राज्य निर्वाचन आयोग के स्तर से चुप्पी और सरकार के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने का मन बनाने से साफ है कि पंचायत चुनाव को लेकर मामला अब और उलझ सकता है। वहीं, पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट में एक और याचिका के दाखिल होने की जानकारी भी देर शाम सामने आई।
...इंतजार पर खेल रहे हैं दांव
दरअसल नामांकन के लिए चार दिन का समय है और ऐसे में एकदम फैसला लेने से बचा जा रहा है। दो से अधिक संतान वाले नियम से प्रभावित न होने वाले प्रत्याशी नामांकन करा ही सकते हैं। ऐसे में नामांकन प्रक्रिया के पूरी तरह से ठप होने के आसार भी कम ही हैं। फिर सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाने से लेकर नए दिशा निर्देश तैयार करने और उन्हें जारी करने के लिए भी समय की दरकार है। सूत्रों के मुताबिक यही वजह है कि हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद भी इंतजार किया गया।
दो से अधिक संतान वालाें को पंचायत चुनाव के लिए अयोग्य घोषित करने के सरकार के फैसले को हाईकोर्ट से हजारों पंचायत चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों को राहत मिली है और सरकार को झटका लगा है।
पंचायतीराज अधिनियम में हुए संशोधन ने इस बार प्रदेश में पंचायत चुनाव की तस्वीर बदल दी थी। दरअसल प्रदेश सरकार ने पंचायतीराज अधिनियम में संशोधन करके दो से अधिक संतान वालों को पंचायत चुनाव के लिए अयोग्य करार दिया था। सरकार ने यह संशोधन करते हुए न तो ग्रेस पीरियड का ही कोई प्रावधान रखा और न ही इसके लिए कोई कट ऑफ डेड तय की। इसका नतीजा ये हुआ कि पंचायत चुनाव में भागीदारी का सपना संजोए, दो से अधिक संतान वाले हजारों इच्छुक लोग चुनाव से बाहर हो गए। खुद न्यायालय को यह कहना पड़ा कि सरकार ने दो से अधिक संतान वालों को एक तरह से दंड दिया। याची पंचायत जन अधिकार मंच के संस्थापक संयोजक जोत सिंह बिष्ट के मुताबिक सरकार के इस फैसले से आधी से अधिक पंचायतों का रिक्त रह जाना तय था। प्रदेश में पंचायत चुनाव में भागीदारी करने वाले आधे से अधिक लोग खासे अनुभवी है और पंचायतों में लंबे समय से सक्रिय हैं। ये लोग ही चुनाव नहीं लड़ पाते और नई पौध को पनपने में समय लगता।
न कट ऑफ डेट, न ग्रेस पीरियड
यह संशोधन अधिनियम लागू करने में ग्रेस पीरियड का प्रावधान भी नहीं किया गया। इसके ठीक विपरीत निकायों में यही प्रावधान लागू करते समय पूर्व में 300 दिन का ग्रेस पीरियड भी लागू किया था। ऐसे मेें एक ही झटके में कई लोग चुनाव लड़ने से बाहर हो गए। इसी तरह से कट ऑफ डेट तय न होने से कई तरह के संशय उठ खड़े हुए। खुद राज्य निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर सरकार को स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया। यही कारण भी रहा कि हाईकोर्ट का फैसला के रूप में सरकार को झटका सहन करना पड़ रहा है।
पंचायत चुनाव की तस्वीर फिर बदली
हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद मात्र तीन माह में प्रदेश में पंचायत चुनाव की तस्वीर फिर बदल गई। अब हजारों दावेदार फिर से चुनाव मैदान में होंगे। शुक्रवार से ही नामांकन शुरू हो रहे हैं लिहाजा प्रत्याशियों के सारे समीकरण भी गड़बड़ा गए हैं। यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब प्रदेश में राजनीति का ककहरा पंचायतों से ही सीखा जा रहा है।
विपक्ष होगा अब और आक्रामक
हाईकोर्ट का यह फैसला अब विपक्ष को और अधिक हावी होने का मौका देगा। पंचायत जन अधिकार मंच और कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर इसका संकेत भी दे दिया है। विपक्ष के पास पंचायत चुनाव में आरक्षण और राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से लिख्ी गई चिठ्ठी का मुद्दा अभी है।