दिव्यांगों के घर जाकर आधार कार्ड बनाने के सरकारी दावों की सच्चाई क्या है? यह देखना है तो बिंदाल के समीप गांधीनगर में आबिद खान को देखिए।
टूटी कमर, नीचे का धड़ बेकार, गहरे बेड सोर (जख्म), दोनों पैर से लाचार, पेशाब की नली लगी कराहती आवाज। आबिद को पांच महीने से दिव्यांग पेंशन नहीं मिली, क्योंकि उसका आधार कार्ड नहीं बन पाया। आबिद की आर्थिक स्थिति इसी पेंशन पर टिकी है।
आबिद खान की स्थिति तो बानगी है। विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश में ऐसे 12,818 और दून में 1,451 दिव्यांग हैं। जिनकी पेंशन आधार कार्ड नहीं बन पाने की वजह से अटकी हुई है।
ढाई साल पहले जब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत का काफिला गांधीनगर पहुंचा था तो आबिद की पीड़ा सुनकर प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें दिव्यांग पेंशन का फार्म पकड़ा दिया था लेकिन उसे जमा करने वाला, कागजी कार्रवाई कराने वाला कोई आबिद के साथ नहीं था।
आबिद ने बताया कि सात साल पहले काम करते हुए वह छत से गिर गए थे। तब उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। इसके साथ ही पैरों में भी चोट आई थी। तब से आबिद बिस्तर से नहीं उठ पाया।
अब स्थिति यह है कि बिस्तर पर बैठे-बैठे आबिद के निचले हिस्सों में घाव हो गए हैं। बेड सोर के चलते दिक्कत बढ़ गई है। आबिद को पेशाब की नली लगी हुई है। पत्नी शहरूनीशा ही आबिद की देखभाल करती हैं।
आबिद ने बताया कि क्षेत्र में ही रहने वाले कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव दीप वोहरा के प्रयास से पेंशन तो बन गई थी लेकिन अब आधार कार्ड न बन पाने की वजह से पेंशन रुक गई है। जिससे आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।