‘रक्त रंजित पथ हमारा, हम पथिक हैं आग वाले, आग का हम राग गाते, पाप की दुनिया जलाते...’ जैसे गीतों और कविताओं से बृहस्पतिवार को नगर निगम का सभागार गूंज उठा। मौका था अंग्रेजों से स्वतंत्रता आंदोलन और टिहरी रियासत से आजादी की लड़ाई लड़ने वाले महान सेनानी व कवि मनोहर लाल उनियाल ‘श्रीमन’ के जन्म शताब्दी समारोह का। कार्यक्रम में प्रदेश के प्रमुख साहित्यकारों, कवियों, लोक कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने शिरकत कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
नगर निगम सभागार में बतौर मुख्य अतिथि कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए मेयर सुनील उनियाल गामा ने टिहरी रियासत की आजादी में उनके योगदान को याद किया। उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार सोमवारी लाल उनियाल ‘प्रदीप’ ने कहा कि मनोहर लाल उनियाल ने राजशाही के जुल्मों को नजदीक से देखा, इसलिए उनकी कविताओं में उसके प्रति विद्रोह साफ झलकता है। अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि राजशाही और सामाजिक विद्रूपों से लड़ते हुए उन्होंने अपनी रचनाओं से काव्य संसार को नया आयाम दिया। गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने श्रीमन की कविता ‘भरकर नभ के खाली कोने, मैला तन पृथ्वी का धोने, उठ सागर के खारेपन को, सुमधुर कर जीवन में लाएं, पावस के बादल घिर आएं’ का पाठ कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार गुरुदीप खुराना ने ‘दीप बुझ लिपट गया तम, मखमल सा रेशमी नरम’ कविता प्रस्तुत की। जनकवि डॉ. अतुल शर्मा ने ‘सूखेगी नदियां तो रोएंगी सदियां, ऐसा न हो प्यारा रह जाए पानी’, अंबर खरबंदा ने ‘जब मुझे सच्चाईयों का मर्म समझाते हैं लोग, क्या बताऊं किस कदर झूठे नजर आते हैं लोग’, कृष्णा खुराना ने ‘कैक्टस के पौधे सी कांटों भरी, टेढ़ी-मेढ़ी बदसूरत जिंदगी, सपनों के पंछी बैठे तो कैसे’, डॉ. असीम शुुक्ल ने ‘एक काम मर-मर कर जीना, और दूसरा जी-जी कर मरना’, डॉ. रामविनय सिंह ने ‘आज फिर इस बाग में असमय हुई बरसात, बोलो क्या करें हम’ और जिया नहटोरी ने ‘अश्क देकर मेरे होंठों की हंसी ले लीजिये, अपना गम दीजिये मेरी खुशी ले लीजिये’ रचना की प्रस्तुति देकर खूब तालियां बटोरी। लोकेश नवानी और डॉ. अश्वघोष ने भी अपनी कविताएं सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। इस अवसर पर मंजू काला, पूनम नैथानी, अवनीश उनियाल, साहित्यकार मुकेश नौटियाल, मुनिराम सकलानी, मधुसूदन सुंदरियाल समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
श्रीदेव सुमन के साथ लड़ी जंग
मनोहर लाल उनियाल की पुत्री कल्पना बहुगुणा ने बताया कि उनके पिता ने श्रीदेव सुमन के साथ मिलकर टिहरी राजशाही के खिलाफ जंग लड़ी थी। इसके चलते उन्हें करीब 18 माह जेल में गुजारने पड़े। जेल की दीवारों पर कविताओं के जरिये वह अपने क्रांतिकारी विचार रखते। सैनिकों ने उन्हें ऐसा करने से रोका लेकिन वह नहीं माने। इस पर बेडियों में जकड़ दिया गया था। टिहरी के राजशाही से मुक्त होने के बाद उन्होंने स्वच्छंद होकर साहित्य सृजन का काम किया।