संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत के उत्तर से विपक्ष उलझन में पड़ गया। पंत का कहना था कि भाजपा सरकार में लाया गया लोकायुक्त विधानसभा की संपत्ति बन चुका है। अब वह सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इसके बारे कार्यमंत्रणा समिति तय करेगी। अलबत्ता उन्होंने वर्ष 2011 में तत्कालीन सरकार से लेकर वर्तमान सरकार में लाए गए लोकायुक्त बिलों के बारे में सिलसिलेवार सूचना दी।
बताया कि 11 सितंबर 2011 को कैबिनेट ने लोकायुक्त बनाने का निर्णय लिया था। 31 अक्तूबर 2011 को लोकायुक्त अधिनियम पारित हुआ। 4 नवंबर को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया। लेकिन 2014 में तत्कालीन सरकार ने 2011 के बिल को निरस्त कर दिया। उस विधेयक में छह माह के भीतर लोकायुक्त बनाने का प्रावधान था, जिसमें 23 दिसंबर 2014 को यह संशोधन किया गया कि लोकायुक्त की नियुक्ति से विधेयक विधेयक लागू हो जाएगा। लेकिन अभी विधेयक अस्तित्व में नहीं है। पंत के जवाब असंतुष्ट विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार लोकायुक्त के मसले को उलझा रही है।
हमने सरकार से भ्रष्टाचार के मसले पर जवाब मांगा था कि वह लोकायुक्त कब बना रही है। लेकिन वह जवाब देना चाहती है। हमने नहीं कहा था कि लोकायुक्त को प्रवर समिति को भेज दो, ऐसा उन्होंने खुद किया। जब हमारे सवालों के जवाब नहीं मिल रहे हैं तो सदन में जाकर हम क्या करेंगे। हमने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया।
-डॉ. इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष