इकलौते बेटे के फांसी लगाने पर पिता हरीश चंद्र परिहार की हालत खराब हो गई। पिता अब खुद को कोस रहे हैं। घर का चिराग बुझने पर मां का रोते-रोते बुरा हाल हो गया है। पड़ोस के लोगों ने मां को समझाने की कोशिश की। घटना की जानकारी मिलने पर रिश्तेदार और परिचित भी घर पहुंच गए थे।
भावनात्मक रूप से कमजोर था करन
पिता के डांटने पर फांसी लगाने वाला करन भावनात्मक रूप से कमजोर था। काउंसलिंग में पाया गया है कि किशोरावस्था में 13 से 17 वर्ष तक के किशोर अंतर्द्वंद्व की अवस्था में होते हैं। इस अवस्था में बच्चों को संभालना मुश्किल होता है। पढ़ाई में रुचि नहीं होने के कारण छात्र निराशा में डूबा था।
ऊपर से डांटने पर और निराशा में डूबता चला गया। आवेश में आकर उसने जीवन का अंतिम कदम उठा लिया। अभिभावकों को अपने किशोर बच्चों को डांटने की जगह किसी विषय की उपयोगिता और महत्व के बारे में समझाना चाहिए।
- डॉ. नेहा शर्मा, मनोवैज्ञानिक
- यह उम्र काफी नाजुक होती है। इसमें डांटने के बजाय बच्चों को प्यार की जरूरत होती है।
- कुछ गलत हो भी गया है तो बच्चों के दृष्टिकोण को समझना चाहिए।
- उनकी रुचि को समझना चाहिए, सटीक लक्ष्य चुनने में मदद करनी चाहिए।
- अभिभावकों को बच्चों को पढ़ाने में मददगार बनना चाहिए।
- कम नंबर आने पर उत्साह भरना चाहिए कि आगे भी परीक्षाएं हैं।
- परीक्षा के हर नतीजों को सकारात्मक रूप से स्वीकार करना चाहिए।
- बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाना चाहिए। उन्हें यथासंभव समय भी देना चाहिए।
- हफ्ते या 15 दिन में एक बार जरूर परिवार के साथ घर से बाहर घूमने जाना चाहिए।