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केदारनाथः ये सात कहानियां पढ़कर रो देंगे आप

Tue, 17 Jun 2014 09:28 AM IST
टीम डिजिटल / अमर उजाला, देहरादून
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पिछले साल 16-17 जून को आई आपदा को एक साल बीत गया। लेकिन अभी भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जिंदगी पटरी पर नहीं लौटी है। आइए पढ़ते हैं आपदा की ऐसी सात कहानियां जिन्हें पढ़कर आप रो देंगे...
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खुद भूख से मर गए
उत्तराखंड स्थित चार धाम यात्रा पर गए हरियाणा के वरिष्ठ आईएएस पी. राघवेंद्र राव के समधी, समधिन और 13 अन्य रिश्तेदारों में से सभी चारों पुरुष अपनी पत्नियों और बच्चों को खाना, बिस्कुट देकर जिंदा रखते रहे और खुद भूख से मर गए।

समधी, समधिन अभी भी लापता हैं। बेटी और दामाद के साथ चार दिन तक उत्तराखंड के सभी बचाव स्थानों पर समधी, समधिन को ढूंढने गए पी. राघवेंद्र राव बाद में चंडीगढ़ लौट गए।
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उन्होंने अमर उजाला को बताया कि विशाखापटनम से समधी, समधिन, समधी की दो बड़ी बहनें, बहनों के तीन बेटे, उनकी पत्नियां और तीन बेटियां, समधी का एक भतीजा और उसकी पत्नी कुल 15 लोग सभी 15 लोग 14 जून को केदारनाथ से गौरीकुंड के बीच रामबाड़ा के पास पहुंचे थे कि अचानक सैलाब आया।

अपनों का आज तक पता नहीं चला
समधी, समधिन एक दुकान में बचने के लिए घुस गए और शेष ऊपर की तरफ पहाड़ पर चढ़ गए। दुकान का सामान बह गया और समधी, समधिन का आज तक पता नहीं चला।

समधी तीन भांजे और एक भतीजे श्यामाप्रसाद (40), सीताराम स्वामी (45), के. रामा राव (42), नारायण राव (35) अपने साथ अन्य महिला सदस्यों के साथ पहाड़ पर रहे।

ठंड बढऩे लगी, भूख और प्यास बढऩे लगी। ग्रुप के पास खाने-पीने को ज्यादा नहीं था। चारों पुरुषों ने खुद कुछ नहीं खाया और सारा सामान दो बुजुर्ग महिलाओं, चारों पत्नियों और तीनों बेटियों को देते रहे।

इस उम्मीद में रहे कि कोई बचाव के लिए आएगा। चार दिन में एक-एक कर चारों पुरुषों की मौत हो गई। एक बुजुर्ग महिला आदि लक्ष्मी (70) भी मर गई। तीन बेटियों समेत पांच महिलाएं बचीं मगर हिंदी नहीं आती थी।

शवों के पास बैठी रहीं। पास में गुजर रहे एक व्यक्ति से किसी तरह मोबाइल मांगा तो उसने सिर्फ एसएमएस करने को कहा। तब उन्होंने विशाखापटनम में एसएमएस से अपनी उपस्थिति की जानकारी दी।

चार दिन तक महिलाएं चिल्लाती रहीं। उनका शोर सुनकर आईटीबीपी और एनडीआरएफ के जवान वहां पहुंचे। उन्होंने कहा कि लाशें वहीं छोड़ दो। अपने चारों पुरुषों और एक महिला के शव को वहीं छोड़ दिया।

लाशों की पॉलिथीन और घोड़ों के कपड़े से बचाई जान

हम 16 जून को केदारनाथ दर्शन के बाद वापस लौट रहे थे। बीच में मौसम खराब हुआ तो रामबाड़ा के एक गेस्ट हाउस में रुक गए। बारिश तेज हो रही थी।

मार्केट में भारी चहल पहल थी, लोग चाय की चुस्कियों का आनंद ले रहे थे। करीब पांच बजे अचानक पहाड़ हिलने लगा, हमसे नीचे वाला गेस्ट हाउस, जिसमें करीब 500 लोग थे, ब्लास्ट के साथ नदी में समा गया।

आपदा के वक्त रामबाड़ा में करीब तीन हजार लोग मौजूद थे। जीवित बचकर लौटी दिल्ली निवासी शकुंतला गुसाईं ने अमर उजाला को आपबीती सुनाई। उनकी आंखों में मौत का खौफ साफ झलकता रहा था।

लाशों को बनाया जान बचाने का सहारा
तेज बारिश से बचने के लिए उन्होंने पास पड़ी लाशों की पॉलिथीन और घोड़ों के कपड़े अपने ऊपर ढके। चार दिन तक बिना खाए-पिये जैसे-तैसे कट गए। सेना के हेलीकॉप्टर जंगलों के बीच वह उन्हें ट्रेस नहीं कर पा रहे थे।

मशक्कत के बाद किसी खाली जगह पर पहुंचे तो सेना ने उन्हें ट्रेस किया। उन्होंने बताया कि भगदड़ के वक्त जो भी नीचे गिर गया, वह नहीं बच पाया। रामबाड़ा में 50 नहीं बल्कि तीन हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है।

घास चबाकर बिताई दो रात

रुद्रप्रयाग में दो दिन तक जंगलों में घास चबाकर किसी तरह जिंदगी बचाई। लुटे-पिटे, हताशा और मायूसी से घिरे रहने के बावजूद मन में यही खयाल आ रहा था कि जिस भगवान ने हमको मुश्किल में डाला।

अब वही हमें बचने का रास्ता भी बताएगा। यह आपबीती जीने की आस लिये गौरीकुंड से 90 किमी पैदल रुद्रप्रयाग पहुंचे चमोली जिले और नेपाल के 150 लोगों ने बयां की।

गौरीकुंड कार पार्किंग में एक कैंटीन में खाना बनाने वाले पुष्कर चौहान (खाल सरमोला जिला चमोली) बताते हैं कि हम तीन लोग कमरे में थे। 15 जून की शाम लगभग छह बजे तेज गडग़ड़ाहट हुई। हम कैंटीन छोड़ गौरीकुंड के ऊपर चले गए।

सूचना मिली की रामबाड़ा में झील टूट गई है
10 मिनट में पूरी पार्किंग बह गई। हम किसी तरह गौरीगांव पहुंचे। यहां रात दो बजे तक हम एक कमरे में रहे। रात में फिर शोर हुआ कि भूस्खलन हो रहा है भागो। हम रात में गांव से दो किमी ऊपर जंगल में चले गए।

16 जून की सुबह फिर गौरीगांव आए, लेकिन सूचना मिली की रामबाड़ा में झील टूट गई है। हम जान बचाने के लिए जंगल में भाग गए। 17 जून की सुबह हम जंगल से सोनप्रयाग की ओर चल दिए।

17 की रात हमने मुंडकटिया में एक गोशाला में बिताई। 15 से हमने आगे चलने का फैसला किया। सोनप्रयाग पावर हाउस के समीप पुल तो बह गया था, लेकिन नदी के दोनों ओर एक पेड़ फंसा हुआ था।

जिस पर सैकड़ों लोगों ने सरक-सरक कर नदी पार की। किसी तरह हम साथी विजय पंत के मामा के घर फाटा पहुंचे।

बचाने वालों के सामने ही मौत का झपट्टा

केदारनाथ और आसपास के क्षेत्रों में हिमालयी सुनामी के बाद ठंड, भूख और प्यास से मौतें हुईं। केदारनाथ वन्यजीव विहार के जंगल में 25 पर्यटकों की ऐसे ही मौत हुई।

यह दर्दनाक मौत एनडीआरएफ (नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स) के आंखों के सामने हुई। जवान रेस्क्यू करने के लिए जंगल में पहुंचे हुए थे, लेकिन रेस्क्यू करते समय ही इन लोगों की मौत हो गई।

जवानों ने हादसे की जानकारी राहत एवं बचाव कार्य के लिए तैनात किए गए आईएएस एवं एमडीडीए वीसी आर मीनाक्षी सुंदरम को दी।

सरकार के निर्देश पर एमडीडीए वीसी आर. मीनाक्षी सुंदरम बृहस्पतिवार सुबह हेलीकाप्टर से रुद्रप्रयाग गए। इसके बाद उन्होंने हेलीकाप्टर से केदारनाथ और आसपास के क्षेत्रों का जायजा लिया।

हर जगह लाशें ही नजर आ रही थीं
शाम के समय से उन्होंने गुप्तकाशी में रुककर कैंप शुरू कर दिया। राहत एवं बचाव कार्य को लेकर विभागों के अधिकारियों की बैठक ली। रात लगभग आठ बजे फोन पर बताया कि हवाई दौरे के दौरान हर जगह लाशें ही नजर आ रही थीं।

केदारनाथ मंदिर परिसर में 25 से 30 लाशें दिखीं। मंदिर परिसर मलबे से पटा नजर आया। मलबा देखकर ही मंजर का अंदाजा लगाया जा सकता था।

उस समय सबसे बड़ी चुनौती बचे लोगों को जीवित निकालने की थी। जो पर्यटक जंगल में फंसे हुए थे।

लाशों के ढेर पर बीती रातें

‘हर तरफ मलबा, चीख-पुकार और तबाही का मंजर। देखते ही देखते सैकड़ों लोग मलबे में दब गए।

दो दिन, दो रातें लाशों के ढेर पर बिताए। फोन करने के बाद भी न शासन मदद को आया और न ही स्थानीय प्रशासन।’
केदारनाथ मंदिर में तीन दिन फंसे रहे बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे आपबीती बताते हुए भावुक हो जाते हैं।

परिजनों और रिश्तेदारों कुल 15 लोगों के साथ चौबे यात्रा पर आए थे। लेकिन जल प्रलय में दो संबंधियों की मृत्यु हो गई और पांच लापता हैं।

चौबे के मुताबिक 16 जून की रात धाम में पहली बार अतिवृष्टि हुई। उस वक्त करीब 700-800 लोग रहे होंगे। भारी मात्रा में पानी पूरे इलाके में पानी भर गया।

17 की सुबह तेज गति से आया मलबाकई होटल-आश्रम क्षतिग्रस्त हो गए। लोगों ने मंदिर में शरण ली। 17 जून की सुबह फिर तेज गति से मलबा आया। बहाव इतना तेज था कि जो उसकी चपेट में आया, वह बह गया या फिर दब गया।

पूरे परिवार के साथ भीगे कपड़ों में दो रातें लाशों के ढेर पर बिताई। फोन पर स्थानीय शासन-प्रशासन से लेकर बिहार सरकार से मदद की गुहार की। कोई मदद को नहीं पहुंचा। छोटे-छोटे बच्चों समेत आठ लोग किसी तरह पैदल चलकर गुप्तकाशी पहुंचे।

डीएम और एसडीएम को फोन किया। लेकिन कोई मदद नहीं मिली। सारी रात परिवार के साथ सड़क पर गुजारी। दूसरे दिन एक ने मंदिर में रुकने की व्यवस्था दी, तब ठंड से जान बची।

पांच दिन संभाले सात शव

हरदोई यूपी निवासी नवल किशोर के सात रिश्तेदारों की रामबाड़ा में मौत हो गई है। बीते रविवार को ये सभी बारिश में बचने के लिए एक खच्चर वाले के पास बैठे थे।

तभी आपदा ने सभी को मौत की नींद सुला दिया। कुछ ही दूरी पर ऊंची चोटी पर बैठा इनका नौकर राहुल और चालक राकेश बाल-बाल बच गए। चारों और मौत का मंजर होने के बावजूद राहुल अपने मालिकों के शवों को छोड़कर आगे नहीं बढ़ा।

राकेश भी उसके साथ था। राहुल ने वायरलेस के जरिये सूचना पहुंचाई तो हरदोई से नवल अंतिम संस्कार का सामान लेकर दून पहुंचे।

नवल ने बताया कि उनके रिश्तेदार ओमप्रकाश पांडे (60), उनकी पत्नी सुषमा पांडे (55), बेटे अनुज (35), अनुज की बहु कुसुम (30), साली प्रेमलता (40), बेटी अंशु (8) और बेटे अभी (5) की रविवार को मौत हो गई थी।

नौकर पिछले पांच दिनों से शवों को संभाल रहा था। उसने किसी तरह परिजनों को सूचना भिजवाई।
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हमारे पास तेजी से आ रही थी नदी...

पहाड़ ने मेरी जिंदगी तबाह कर दी। सपने में भी नहीं सोचा कि मेरा जीवन ऐसे बिखर जाएगा। मेरी पत्नी और छोटा बेटा मुझसे बिछड़ जाएंगे। आगे का जीवन कैसे कटेगा।

यह कहते-कहते जोधपुर के रहने वाले दिनेश राठी का मुंह बंद हो जाता है। कुछ मिनट के लिए वह बिल्कुल चुप हो जाते हैं। एक लंबी सांस लेने के बाद वह कहते हैं कि 16 जून सुबह पूरे परिवार के साथ केदारनाथ का दर्शन करके रामबाड़ा लौट रहा था।

बाबा के दर्शन करके पूरा परिवार खुश था। मां पालकी में थी और हम सभी पैदल थे। कुछ देर पहले ही मां पालकी से उतरकर पैदल चल रही थी। लगभग सात बजे अचानक एक आवाज सुनाई दी।

मैं अपनी मां को लेकर पहाड़ पर चढ़ने लगा
पीछे मुड़कर देखा तो ऐसा लगा कि नदी तेजी से हमारे पास आ रही थी। मैं अपनी मां को लेकर पहाड़ पर ऊपर चढ़ने लगा। पत्नी और मेरा छोड़ा बेटा कुश दूसरी ओर भागे।

ये दोनों पहाड़ पर नहीं चल पाए। पत्नी की तो मौके पर ही मौत हो गई, जबकि छोटा बेटा लापता हो गया। बड़ा बेटा कुशल (उम्र 18 साल) और मेरी बहन का बेटा सार्थक किसी तरह बच गए।

उनके सिर में गंभीर चोटें आई थीं, जबकि मेरी मां भी काफी जख्मी थीं। उन्होंने बताया कि पत्नी का शव दस किलोमीटर पैदल लाए। बाद में नदी में शव प्रवाहित कर दिया।
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