पिछले साल 16-17 जून को आई आपदा को एक साल बीत गया। लेकिन अभी भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जिंदगी पटरी पर नहीं लौटी है। आइए पढ़ते हैं आपदा की ऐसी सात कहानियां जिन्हें पढ़कर आप रो देंगे...
खुद भूख से मर गए
उत्तराखंड स्थित चार धाम यात्रा पर गए हरियाणा के वरिष्ठ आईएएस पी. राघवेंद्र राव के समधी, समधिन और 13 अन्य रिश्तेदारों में से सभी चारों पुरुष अपनी पत्नियों और बच्चों को खाना, बिस्कुट देकर जिंदा रखते रहे और खुद भूख से मर गए।
समधी, समधिन अभी भी लापता हैं। बेटी और दामाद के साथ चार दिन तक उत्तराखंड के सभी बचाव स्थानों पर समधी, समधिन को ढूंढने गए पी. राघवेंद्र राव बाद में चंडीगढ़ लौट गए।
उन्होंने अमर उजाला को बताया कि विशाखापटनम से समधी, समधिन, समधी की दो बड़ी बहनें, बहनों के तीन बेटे, उनकी पत्नियां और तीन बेटियां, समधी का एक भतीजा और उसकी पत्नी कुल 15 लोग सभी 15 लोग 14 जून को केदारनाथ से गौरीकुंड के बीच रामबाड़ा के पास पहुंचे थे कि अचानक सैलाब आया।
अपनों का आज तक पता नहीं चला
समधी, समधिन एक दुकान में बचने के लिए घुस गए और शेष ऊपर की तरफ पहाड़ पर चढ़ गए। दुकान का सामान बह गया और समधी, समधिन का आज तक पता नहीं चला।
समधी तीन भांजे और एक भतीजे श्यामाप्रसाद (40), सीताराम स्वामी (45), के. रामा राव (42), नारायण राव (35) अपने साथ अन्य महिला सदस्यों के साथ पहाड़ पर रहे।
ठंड बढऩे लगी, भूख और प्यास बढऩे लगी। ग्रुप के पास खाने-पीने को ज्यादा नहीं था। चारों पुरुषों ने खुद कुछ नहीं खाया और सारा सामान दो बुजुर्ग महिलाओं, चारों पत्नियों और तीनों बेटियों को देते रहे।
इस उम्मीद में रहे कि कोई बचाव के लिए आएगा। चार दिन में एक-एक कर चारों पुरुषों की मौत हो गई। एक बुजुर्ग महिला आदि लक्ष्मी (70) भी मर गई। तीन बेटियों समेत पांच महिलाएं बचीं मगर हिंदी नहीं आती थी।
शवों के पास बैठी रहीं। पास में गुजर रहे एक व्यक्ति से किसी तरह मोबाइल मांगा तो उसने सिर्फ एसएमएस करने को कहा। तब उन्होंने विशाखापटनम में एसएमएस से अपनी उपस्थिति की जानकारी दी।
चार दिन तक महिलाएं चिल्लाती रहीं। उनका शोर सुनकर आईटीबीपी और एनडीआरएफ के जवान वहां पहुंचे। उन्होंने कहा कि लाशें वहीं छोड़ दो। अपने चारों पुरुषों और एक महिला के शव को वहीं छोड़ दिया।