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आपदाः सदमे से पागलपन का शिकार हो रहे लोग

Mon, 16 Jun 2014 02:00 PM IST
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
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आपदा की बरसी हो चुकी है, लेकिन उसके जख्म अभी भी लागों के दिलो दिमाग में एकदम ताजा हैं।
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अपनों के साथ सब कुछ गंवाने के सदमे में सैंकड़ों लोग डिप्रेशन की चपेट में हैं, लेकिन सरकार उनका इलाज तो दूर हाल पूछने को तैयार नहीं है।

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस (निमहास) बंगलुरु ने रुद्रप्रयाग, चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी में डेढ़ माह का अध्ययन कर एक झकझोर देने वाली रिपोर्ट केंद्र को सौंपी जिसपर अनुपालन के सिर्फ दावे हुए लेकिन इलाज नहीं मिला।

मेंटल ट्रॉमा से सर्वाधिक प्रभावित बच्चों और महिलाओं बच्चों की सुध लेने को कोई तैयार नहीं है।
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स्थानीय लोगों में मानसिक असंतुलन

निमहास के 12 विशेषज्ञों ने आपदा के चार माह बाद अक्टूबर 2013 में आपदा से स्थानीय लोगों के मानसिक असंतुलन की रिपोर्ट तैयार कर केंद्र को सौंपी।

रिपोर्ट में सैंकड़ों ऐसे मामले दर्शाए गए जिनको लंबे समय तक काउंसलिंग और इलाज की जरूरत बताई गई है। केंद्र ने राज्य को राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल करने की राज्य से योजना मांगी।

स्वास्थ्य महकमे ने आनन फानन में कार्ययोजना बना केंद्र को भेजी, जिसकी मंजूरी मिले 7 माह बीत गए लेकिन काम शुरू नहीं हुआ।

जहां प्रत्येक प्रभावित जिले में एक साइकेटरिस्ट काउंसलिंग सेंटर खुलकर गांवों में जाना था वहां राज्य में आज भी हालत जस के तस हैं। मनोरोग की स्थिति से निपटने को केवल दो साइकेटरिस्ट हैं। इनमें से एक के पास तो दोहरी जिम्मेदारी है।

मनोरोग विशेषज्ञों तैनात करने के साथ कई डाक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की आपदा के बाद सदमे से निपटने की ट्रेनिंग तक शुरू नहीं हो पाई।

निमहास की रिपोर्ट

घोषणा के बावजूद सदी की सबसे बड़ी त्रासदी झेल चुके उत्तराखंड को राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में कोई कार्य शुरू नहीं हुआ।

राज्य सरकार ने इसके लिए कोई पैरवी भी केंद्र से नहीं की। सरकार मानो यह माने बैठी है कि समय के साथ आपदा की मार के साथ सदम झेल रही जनता खुद उभर जाएगी।

निमहास बंगलुरू ने रुद्रप्रयाग, चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी में बच्चों, महिलाएं और बुजुर्गों के दिमागी संतुलन बैठा पाने में दिक्कतों को लिखा था।

रुद्रप्रयाग और चमोली जनपद में हालात सबसे गंभीर है। यहां प्रभावित लोगों की कल्पना पर बाढ़, मलबा और मौतों का असर हावी हो गया है।

यह पड़ा है लोगों पर असर

- साथ वालों की मौत से अपराध बोध
- पागलपन (साइजोफ्रेनिया) की स्थिति
- बच्चों में असुरक्षा का बढ़ती भावना
- डिप्रेशन से आत्महत्या के ख्याल
- नींद न आना या फिर डर के नींद से उठना

धूल फांक रही स्वीकृत योजना
- प्रत्येक पर्वतीय जनपद में 10 बेड का साइक्रेटिक सेंटर
- जनपद स्तर पर मनोरोग विशेषज्ञ व काउंसलिंग सेंटर
- सेलाकुईं में 100 बेड का अस्पताल व ट्रेनिंग सेंटर
- निमहास की मदद से चिकित्सकों को ट्रेनिंग कैप्सूल
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एक साल बाद भी हाथ खाली के खाली

टिहरी के परोड़ी गांव के लोग आपदा खौफनाक मंजर एक साल बाद भी नहीं भूल पाए हैं। आपदा ने गांव के 35 परिवारों पर ऐसा कहर बरपाया कि वह उससे आज तक नहीं उबर पाए हैं।

सरकार ने मदद का भरोसा दिया तो लोगों में फिर से खड़े होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी उनके हाथ खाली ही हैं।

16 जून की बारिश में परोड़ी गांव तबाह हो गया। 18 घरों में रहने वाले 35 परिवार एकाएक सड़क पर आ गए। कुदरती कहर के चलते संपन्न परिवारों के पास बदन के कपडे़ के सिवा कुछ नहीं बच पाया।

आपदा के बाद स्वयंसेवी संस्थाओं ने तन ढकने को कपड़े दिए तो सरकार ने जल्द ही गांव को पुनर्स्थापित करने का भरोसा दिया था, जिसके एवज में 18 परिवारों को दो-दो लाख रुपए का मुआवजा दिया गया।

लेकिन उन मकानों में जो 17 परिवार और निवास कर रहे थे, उन्हें आज तक कुछ नहीं मिल पाया है। जिससे पीड़ित परिवार छानियों में गुजर-बसर कर रहे हैं।
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