जो बेटे अपने बुजुर्ग मां-बाप की नाफरमानी करते हैं, उनके रहने, खाने-पीने का ख्याल नहीं रखते हैं और उन्हें अपमानित करते हैं, वे अब सुधर जाएं।
अगर नहीं सुधरे तो अब उन्हें सुधारने वाली अदालत बन गई है। मां-बाप ने अगर यहां शिकायत की तो एक महीने तक जेल की हवा खाएंगे। मां-बाप के खर्च के लिए उनके वेतन या बैंक बैलेंस से रिकवरी अलग से होगी। यह काम एसडीएम की अध्यक्षता में गठित भरण पोषण प्राधिकरण करेगा।
बूढ़े मां-बाप को सुरक्षा देने के लिए केंद्र सरकार ने कानून सात साल पहले ही बना दिया था। लेकिन इस पर कोई अमल नहीं हो रहा था। वजह यह थी कि माता-पिता अधिनियम-2007 की धाराओं पर केस चलाने के लिए शासन-प्रशासन के पास अदालतें नहीं थीं।
किसी अधिकारी को अपीलीय अधिकारी नहीं बनाया गया था। इससे इस दिशा में कोई काम नहीं हो पाया। वैसे जिला प्रशासन के पास पुत्रों से पीड़ित माता-पिता के दो-चार शिकायती पत्र हर माह आते रहे हैं। इन शिकायती पत्रों को डीएम कभी पुलिस और कभी एडीएम, एसडीएम को रेफर कर देते हैं। लेकिन इन शिकायतों पर माता-पिता अधिनियम के तहत कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई।