अपने चहेतों को कुर्सी दिलाने के लिए एक कद्दावर मंत्री अक्सर अपने विभागीय हाकिम से भिड़ जाते हैं। अपनी इसी जिद के बूते अपने कई चहेतों को कुर्सी दिलवा चुके हैं। हाकिमों के हाथ नियम कानून से बंधे हैं लेकिन मंत्री तो खुद को सबसे ऊपर मानते हैं।
बेआबरू होकर कुर्सी छोडऩी पड़ी
यह बात और है कि हर बार मीडिया ट्रायल में फंसने के बाद उनके चेहतों को बड़े बेआबरू होकर कुर्सी छोडऩी पड़ी। चहेते ही क्यों खुद मंत्री जी भी अब तक दो बार मनमानी कर हासिल किये पदों से इस्तीफा देकर सरकार को शर्मसार कर चुके हैं। लेकिन इस बार तो मंत्री ने सभी हदें लांघ डाली हैं।
एक अखिल भारतीय सेवा के पद को उत्तराखंडी मूल के लिए आरक्षित कर अपने चेहते को तैनात करने के लिए अड़ गए हैं।
हाकिम समझा चुके कि चयन हो चुका है, नियमावली में अब संशोधन नहीं हो सकता। लेकिन नियम कानून तो मंत्री जेब में रखकर घूमते हैं सो हर बार की तरह अड़ गए हैं। मजे की बात तो यह है कि चयन के लिए खुद मंत्री ने फाइल पर अनुमोदन दिया था, लेकिन अब मुकर रहे हैं।
अनपढ़ की तरह लगाए हैं रट
पोस्ट ग्रेजूएट होने के बावजूद एक अनपढ़ की तरह रट लगाए हैं कि फाइल में पता नहीं क्या लिखा था। खैर इस बार मंत्री की जिद के आगे हाकिम डटे हैं। हाकिम अच्छे से जानते हैं कि अगर मंत्री की सुन कर मैरिट लिस्ट बदलते हैं तो कोर्ट उनकी खाट खड़ी कर देगा। अब देखना यह है कि हर बार अपने बात मनवाने वाले मंत्री अब कौन सी चाल चलते हैं।