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उत्तराखंड में कईयों पर भारी पड़ी नोटा 'लहर'

Sat, 17 May 2014 12:14 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में केवल मोदी की ही लहर रही। नोटा ने भी कई पार्टियों को वोट के मामले में पीछे कर दिया।
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नन ऑफ द अबव या कहें इनमें से कोई नहीं। इस विकल्प पर उत्तराखंड की हर सीट पर खासी संख्या में वे मतदाता भी रहे जिन्हें कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आया।

इसमें एक प्रतिशत उन लोगों को भी जोड़ा जा सकता है जिन्होंने मतदान का बहिष्कार किया। इस हिसाब से देखा जाए तो नोटा का खासा उपयोग कर मतदाता यह भी बता रहे हैं कि चुनाव को लेकर गंभीर नही हैं तो किनारे बैठो।

2014 के लोक सभा चुनाव में जरा नोटा का कमाल देंखे। अल्मोड़ा सीट पर करीब ढाई प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना। टिहरी में करीब डेढ़ प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा को वोट दिया। बाकी जगह भी करीब एक प्रतिशत नोटा गया।
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नोटा बना मजबूत ताकत, संदेश साफ

किसी भी सीट पर करीब एक प्रतिशत वोट नोटा के लिए जाना चिंताजनक नहीं माना जा सकता। पर इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि कांग्रेस-भाजपा के अलावा नोटा करीब-करीब हर सीट पर एक ताकत के रूप में उभरा है।

अल्मोड़ा में कांग्रेस-भाजपा के बाद सबसे अधिक वोट नोटा पर पड़े है। अल्मोड़ा में तीसरी बड़ी ताकत बसपा थी पर नोटा को बसपा से अधिक वोट पड़े हैं।

नैनीताल में करीब एक प्रतिशत वोट नोटा पर पड़ा है। यह वह सीट है जहां भाजपा रिकार्ड मार्जिन से जीती। पर कांग्रेस-भाजपा के अलावा सबसे अधिक वोट बसपा और आप को और इसके बाद नोटा को वोट पड़े हैं।

साफ है कि कांग्रेस-भाजपा केअलावा बाकी अन्य दलों के लिए मतदाताओं का साफ संकेत है कि चुनाव को लेकर गंभीर नहीं तो किनारे बैठो।

...तो यह होगा अगला कदम

नोटा के विकल्प का अगला कदम अब यह भी है कि नोटा अगर जीतने वाले उम्मीदवार से अधिक है तो चुनाव दोबारा हो।

इस हिसाब से देखा जाए तो नोटा इस बार के चुनाव में क्षेत्रीय और अन्य दलों के उम्मीदवारों को यह भी बता रहा है कि उनका चुनाव लड़ना मानीखेज नहीं है। दूसरी ओर कांग्रेस-भाजपा को भी नोटा के अधिक बढ़ने से चिंता होनी चाहिए।

यही रफ्तार रही तो नोटा इन दलों के लिए भी परेशानी का सबब बन सकता है। कारण नोटा में वो लोग भी शामिल होंगे जो अपनी पार्टी के अलावा किसी ओर को वोट देना नहीं चाहते पर अपनी पार्टी का उम्मीदवार भी उन्हें पसंद नहीं।

साफ है कि कांग्रेस-भाजपा पर भी इस बात का दबाव बढ़ेेगा कि उम्मीदवार को चयन करते समय अधिक विश्वसनीयता बना कर रखी जाए।

कहां क्या रही स्थिति

अल्मोड़ा-कांग्रेस, भाजपा के बाद नोटा में सबसे ज्यादा वोट, तीसरा नंबर
टिहरी-कांग्रेस, भाजपा, बसपा और आम आदमी पार्टी केबाद नोटा
हरिद्वार- कुल 24 प्रत्याशियों में से नोटा का नंबर आठवां
नैनीताल-कुल 15 प्रत्याशियों में से नोटा को मिला पांचवा नंबर
गढ़वाल-दस प्रत्याशियों में से नोटा का नंबर चौथा
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पसंद नहीं आए उम्मीदवार

विशेषज्ञों की नजर में नोटा का मतलब है कि मतदाता वोट देना चाहता है पर कोई भी उम्मीदवार उसे पसंद नहीं है। चुनाव आयोग को यह विकल्प सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ईवीएम में शामिल करना पड़ा था।

पहले वोट बेलेट पेपर से दिए जाते थे और किसी भी उम्मीदवार को पसंद न करने वाले ये मतदाता एक ही जगह पर दो बार ठप्पा लगाकर वोट बेकार कर देते थे। पर ईवीएम में मतदाताओं को यह विकल्प नहीं मिल पा रहा था।

कईयों ने किया मतदान बहिष्कार
नोटा को व्यवस्था विरोध के रुप में नहीं देखा जा सकता पर इतना जरूर है कि मतदान चुनाव का बहिष्कार करने वाले भी कई लोग प्रदेश में हैं और ये लोग नोटा का उपयोग कर सकते थे। इस तरह करीब एक प्रतिशत मतदाता ऐसे भी रहें जो वोट देना चाहते थे पर उन्होंने मतदान का बहिष्कार करने जैसा अतिवादी कदम उठाया।
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