बस हैं, यात्री हैं पर टिकट मशीनें नहीं। हैं ना हैरानी भरी बात। ये कहानी नहीं बल्कि देहरादून स्थित सबसे बड़े परिवहन ग्रामीण डिपो की हकीकत है।
रोजाना यहां से तकरीबन 100 से ज्यादा बसें चलती हैं लेकिन 90 बसों में ही इलेक्ट्रॉनिक टिकटिंग मशीन है, जबकि 10 बसें इन मशीनों के बगैर ही चल रही हैं।
ऐसे में विभाग की को चूना लगना स्वाभाविक है। गौर करने वाली बात यह है कि यह कोई एक दो दिन की बात नहीं है बल्कि जब से ई टिकटिंग व्यवस्था शुरू हुई है तब से यही हाल हैं। इसके बावजूद परिवहन निगम के अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं।
राज्य के सबसे बड़े डिपो ग्रामीण डिपो से पांच हाईटेक, 65 ग्रामीण और 30 अनुबंधित बसें संचालित होती हैं। सूत्रों की मानें तो पिछले छह महीने से 10 मशीनें खराब पड़ी है, इसके चलते बगैर ई टिकटिंग मशीन चलने वाली बसों की संख्या 20 हो गई है।
मशीन खराब होने की वजह कुछ और नहीं बल्कि छह माह पहले दिल्ली से मंगाए गए पेपर रोल का बेहद खराब क्वालिटी का होना है। रोडवेज ने कंडक्टरों की मनमानी और डग्गामारी को रोकने के लिए 2013 से ई- टिकट प्रणाली शुरू की थी। ऐसे में दोबारा से बसों में मैन्युल टिकट देने से घपलेबाजी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
अनभिज्ञ हैं एमडी
मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। कितनी मशीनें कहां, कहां हैं मुझे कुछ भी जानकारी नहीं है।
- बृजेश कुमार संत, प्रबंध निदेशक, उत्तराखंड परिवहन निगम
करीब एक साल से नई मशीनों की खरीद नहीं हो पा रही है। इससे कंडक्टर भी परेशान हैं क्योंकि सीमांत क्षेत्रों में भी अब ई-टिकटिंग से ही किराया काटा जाता है।
- रवि पचौरी, प्रदेश महामंत्री, उत्तराखंड रोडवेज इम्लाइज यूनियन
रिपेयरिंग का खेल
परिवहन विभाग के पुख्ता सूत्रों के हवाले से मिली खबर के अनुसार अधिकारी इसलिए भी नई मशीनें नहीं खरीद रहे हैं क्योंकि रिपेयरिंग के नाम पर पूरे राज्य के लिए हर माह एक लाख रुपये जारी किए जाते हैं।
अगर नई मशीनें आ गई तो ये अंधी कमाई कहां से होगी। सोचने वाली बात यह है कि कोई मशीन के लिए परेशान हैं तो कोई अपनी कमाई के लिए। वहीं रोडवेज के कर्मियों की एक ओर फजीहत हो रही है वहीं दूसरी ओर निगम को सीधे-सीधे प्रतिदिन करोड़ों की चपत लगने की पूरी पूरी संभावना है।