भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) का कहना है कि 16-17 जून की आपदा से केदारनाथ मंदिर को नुकसान नहीं हुआ है।
मंदिर परिसर के चबूतरे में छोटी-छोटी दरारें हैं पर यह कहना मुश्किल है कि यह दरारें पहले की हैं या आपदा के कारण आई हैं। इतना साफ है कि इन दरारों को भरा जा सकता है।
नए निर्माण न करने का सुझाव
जीएसआई ने मंदिर परिसर के चारों और 150 मीटर के दायरे में कोई निर्माण न करने का सुझाव भी दिया है और यह भी कहा है कि इस दायरे में मलवा हटाने के लिए भारी मशीनों के बजाय क्लीन ब्रेक तकनीक का इस्तेमाल किया जाए।
मलबे से कम से कम छेड़छाड़ की जाए और केदारनाथ मंदिर के दक्षिण में कस्बे को शिफ्ट किया जाए।
मु्ख्य सचिव को सौंपी रिपोर्ट
गुरुवार को जीएसआई की राज्य इकाई के निदेशक डा. वीके शर्मा ने सचिवालय में मुख्य सचिव सुभाष कुमार को यह रिपोर्ट सौंपी।
इस तरह तैयार हुई रिपोर्ट
केदारनाथ आपदा के बाद जीएसआई की 21 विशेषज्ञों की टीम ने पांच आपदा प्रभावित जिलों के भूवैज्ञानिक, भूभौतिकी, हिमनद आदि का सर्वे कर यह रिपोर्ट तैयार की।
इस रिपोर्ट में केदार मंदिर का अध्ययन ग्राउंड पेंट्रेटिंग रिपोर्ट (जीपीआर) के जरिए किया गया। जीएसआई की रिपोर्ट में स्लोप स्टेबलाइजेशन( भू स्थायित्व) पर भी खासा जोर दिया गया।
मंदिर के पास 15 मीटर मलबा
रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ मंदिर को आपदा से कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। मंदिर के चारों और 50 सेमी से लेकर पांच मीटर तक का मलबा है। उत्तरी क्षेत्र में करीब 15 मीटर मलबा जमा है। यह मलबा ग्लेशियर के बड़े-बड़े पत्थरों, मिट्टी आदि का बना हुआ है।
भारी मशीनों के प्रयोग से मंदिर को नुकसान
रिपोर्ट के मुताबिक भारी मशीनों से इस मलबे को हटाने से मंदिर परिसर को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में जीएसआई ने मलबा हटाने के लिए क्लीन ब्रेक तकनीक (नियंत्रित रूप से विस्फोटकों का इस्तेमाल कर इस तरह से पत्थरों को तोड़ना कि वे जगह-जगह फैलें न) का उपयोग करने का सुझाव दिया है।
जीएसआई की राज्य इकाई के निदेशक डा. वीके शर्मा के मुताबिक मंदिर परिसर के चारों ओर 150 मीटर के दायरे में कोई निर्माण न करने का सुझाव भी दिया गया है।
आपदा के बाद नदी ने बदला रास्ता
जून की आपदा के बाद केदार धाम में मंदाकिनी नदी ने रास्ता ही बदल दिया है। नदी पहले मंदिर के पश्चिम में बहती थी। आपदा के बाद अब यह पूर्व में सरस्वती नदी से मिलकर बह रही है।
जीएसआई ने नदी को मूल स्थान पर वापस लाने के लिए काम करने और मंदिर की ओर के नदी तट पर पत्थर की सुरक्षात्मक दीवार बनाने का सुझाव भी दिया है।
रिपोर्ट में केदारनाथ मंदिर के दक्षिण में कस्बे को शिफ्ट जाने की बात की गई है पर यह भी साफ कर दिया गया है कि कोई भी निर्माण कार्य भू स्थायित्व अध्ययन को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए।
सड़कों के लिए सुरंगों का सुझाव
इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए जीएसआई ने 67 आपदा प्रभावित गांवों, 274 भूस्खलन क्षेत्रों और करीब एक हजार किलोमीटर लाइन सर्वे किया। रिपोर्ट में सड़क मार्ग पर कई स्थानों पर सुरंग का निर्माण करने का सुझाव भी दिया गया है।
इसके अलावा नदी के किनारे बाढ़ सुरक्षा के कार्य करने, ढाल का स्थायीकरण करने, भू स्थायीकरण आदि के दीर्घकालिक सुझाव दिए गए हैं।
आपदा प्रभावित 67 गांवों का सर्वे
आपदा केबाद जीएसआई ने रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों के 67 गावों का विस्तृत भू वैज्ञानिक अध्ययन किया।
डा. वीके शर्मा के मुताबिक रिपोर्ट में सरकार से यह भी कहा गया है कि जिन गांवों को विस्थापित किया जाना हैं उनके लिए स्थायी जमीन चिन्हित कर जीएसआई को बता दी जाए। जीएसआई इस जमीन के भू-स्थायित्व का अध्ययन करेगी।
आपदा को बताया प्राकृतिक
केदारनाथ की आपदा के बाद यह बहस भी उठ खड़ी हुई थी कि 16-17 जून की आपदा कितनी मानव जनित और कितनी प्राकृतिक है। मुख्य सचिव सुभाष कुमार के मुताबिक जीएसआई ने रिपोर्ट में आपदा को पूरी तरह से प्राकृतिक बताया है।
जाहिर है कि सरकार यह तर्क नदियों पर बांधों को विनाश को बढ़ाने वाला बताने वालों को रास नहीं आएगा। ऐसे में यह बहस नए सिरे से पनप सकती है। सरकार ने अभी रिपोर्ट का खुलासा नहीं किया है और न ही यह रिपोर्ट पब्लिक डोमेन में है।
इनका है कहना
प्रभावित 67 गांवों का विस्तृत अध्ययन कर लिया गया है। यह काम अब भी जारी है। जीएसआई पूरी ताकत से यह काम कर रहा है। जल्द ही अन्य गांवों का अध्ययन भी कर लिया जाएगा। सरकार को सौंपी गई विस्तृत रिपोर्ट में प्रत्येक स्थल की भू संरचना, भू आकृति, भू स्थायित्व आदि के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर दीर्घकालिक और अल्पकालिक उपाय सुझाये गए हैं। केदारनाथ मंदिर के अध्ययन के लिए अलग से दल केदारनाथ भेजा गया था। इस दल की रिपोर्ट को पुरातात्विक विभाग को भी सौंपा जा चुका है।
-डा. वीकेशर्मा, निदेशक जीएसआई उत्तराखंड इकाई