उत्तराखंड के जिलों में विकास कार्य, जनसमस्याओं का निवारण और सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने में राजनीतिक जुगाड़बाजी भारी पड़ती दिख रही है।
प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट की मानें तो एक जिले में डीएम का कार्यकाल दो वर्ष होना ही चाहिए, लेकिन सियासी रसूख और मनपसंद तैनाती के चक्कर में ये सब बातें किनारे हो गई हैं। उत्तरकाशी समेत कई जिले इस बात का जीता जागता उदाहरण हैं।
उत्तरकाशी जिले में 54 वर्षों में जिलाधिकारी के पद पर 46 आईएएस अफसरों की नियुक्ति हुई। इस हिसाब से एक डीएम का कार्यकाल औसतन सवा साल भी नहीं रहा। यह स्थिति तब है जबकि पहले डीएम ऊषापति भट्ट 4 साल और खुशाल चंद मल्होत्रा 5 साल (1980-85) डीएम रहे।
यह हाल तब है जबकि उत्तरकाशी आपदाग्रस्त जिलों में शुमार है और एक डीएम को यह जिला समझने में ही कम से कम तीन महीने लग जाते हैं। वहीं एक और आपदाग्रस्त जिले पिथौरागढ़ से भी हरीश चंद सेमवाल को 10 महीने में ही हरिद्वार स्थानांतरित कर दिया गया।
इससे लगता तो यही है कि प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों और जिलों के सुधार को सिर्फ राजनीतिक जुगाड़बाजी की भेंट चढ़ाया जा रहा है। हालांकि कुछ मामले इसके उल्ट भी हैं जैसे कि एस मुरूगेशन ढाई साल तक आपदाग्रस्त जिले चमोली के डीएम रहे हैं। हाल ही में उन्हें हरिद्वार मेला मजिस्ट्रेट बनाया गया है।
तीन मैदानी जिलों में सीधी भर्ती वाले आईएएस डीएम
राज्य में इस समय 13 जिलों में से तीन मैदानी जिलों (देहरादून, यूएसनगर व नैनीताल) में सीधी भर्ती वाले आईएएस डीएम हैं। जबकि हरिद्वार समेत 10 जिलों में पीसीएस से आईएएस सेवा में पदोन्नत हुए अफसर जिलाधिकारी हैं।
पहाड़ में तैनाती के मानक पुराने
पहाड़ में अब भी डीएम की तैनाती के मानक पुराने ही हैं। आईएएस सीधी भर्ती का हो या फिर पदोन्नति से आईएएस बना हो, बतौर डीएम पहला जिला पहाड़ का मिलता है। ये बात अलग है कि राजनीतिक रसूख वाले थोड़े ही दिन बाद मैदान में अच्छी पोस्टिंग पा लेते हैं। भले ही जिला मिले या कोई और पद।
वहीं, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि तबादले की पृष्ठभूमि में कई कारण होते हैं। खास बात यह भी है कि पीसीएस से आईएएस प्रमोट हुए अफसर पहाड़ में ज्यादा तैनाती पाते हैं। हालांकि, ऐसे कई मौके आए जब कई सीधी भर्ती वाले आईएएस और कुछ पीसीएस से आईएएस बने अफसरों ने सरकार को पहाड़ पर जाने से साफ इंकार कर दिया।
सूक्ष्म कार्यकाल का प्रभाव
जिले को समझने में ही तीन चार महीने लगते है
जनसमस्याओं के निवारण की प्रक्रिया बाधित होती है
डीएम का काम समन्वय का है, बार बार बदलने से अफसरों पर पकड़ नहीं रहती
डीएम कोर्ट में मुकदमों के निस्तारण में विलंब होता है
सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन समय से नहीं होता
जिले के विकास के लिए दीर्घकालीन योजनाएं नहीं बनती
डीएम ही नहीं सीडीओ का भी एक जिले में कम से कम दो साल का कार्यकाल होना बहुत जरूरी है। कोई भी डीएम दो साल से पहले एक जिले में दैवी आपदा के मिजाज को नहीं समझ सकता। तबादले की अनिश्चितता प्रशासनिक मशीनरी को नुकसान पहुंचाती है। उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ तो सीमांत जिले हैं, यहां तो यह नियम सख्ती से लागू हो। इन जिलों में हिमाचल के लाहौल स्पीति की तर्ज पर कलक्टरों को शासन से वित्त अधिकार मिलें, ताकि धनराशि को एक मद से दूसरी मद में ट्रांसफर कर जनहित में काम हों।
- बिजेंद्र पाल, सेवानिवृत्त आईएएस