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पुलिस हेडक्वार्टर पर नहीं गृह विभाग का कंट्रोल

Tue, 28 Oct 2014 02:13 PM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
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2008 में उत्तराखंड पुलिस विभाग में मिनिस्ट्रीयल संवर्ग के पदों पर भर्ती में हुई गड़बड़ी की जांच रिपोर्ट ने पीएचक्यू की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।
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ऐसे पदों पर भर्ती जो हैं ही नहीं
जांच अधिकारी अपर मुख्य सचिव एस राजू ने संवर्ग के 26 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया को अनियमित करार देते हुए यहां तक टिप्पणी की कि यह कृत्य गृह विभाग के पीएचक्यू पर नियंत्रण नहीं होने की मिसाल है। क्योंकि शासन की अनुमति के बगैर ऐसे पदों पर भर्ती की गई जो वजूद में ही नहीं थे।

जांच अधिकारी ने विगत 22 जुलाई 2014 को जांच रिपोर्ट गृह विभाग को सौंप दी है। यह मामला साल 2007-08 का है। पीएचक्यू ने एसआई (मिनिस्ट्रीयल) के 26 पदों के विरुद्ध कांस्टेबल (मिनिस्ट्रीयल) के पदों पर भर्ती कर दी। इस भर्ती में दो तरह की अनियमितता हुईं।
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एक तो कांस्टेबल (एम) के पद ही वजूद में नहीं थे और दूसरे शासन से भर्ती की अनुमति नहीं ली गई। मामला उच्च न्यायालय गया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री ने 27 जुलाई 2013 को अपर मुख्य सचिव एस राजू को पूरे मामले की जांच करने के आदेश दिए।

इस मामले की हाल में आई जांच रिपोर्ट के बाद गृह और पुलिस विभाग में भूचाल की स्थिति बनी हुई है। जांच अधिकारी ने कहा कि गृह विभाग के पत्र का जवाब देने के बजाय पीएचक्यू का 27 अक्तूबर 2008 को अपर सचिव कार्मिक से भर्ती की अनुमति मांगना अनुशासनहीनता है।

तत्कालीन डीजीपी सुभाष जोशी व एडीजी जेएस पांडे ने तथ्यों को उजागर करने के बजाय भर्ती होने दी। शासन ने पूर्व में इन पदों पर हुई प्रक्रिया को जानना चाहा, लेकिन पीएचक्यू ने जवाब नहीं दिया।

पीएचक्यू ने भर्ती में इतनी जल्दबाजी क्यों की, तत्कालीन डीजीपी ने शासन के साथ बैठक कर इन बिन्दुओं का निस्तारण क्यों नहीं किया, इनका जवाब संबंधित अफसरों से लेना उचित होगा।

जांच अधिकारी ने स्पष्ट किया कि यह सब पुलिस मुख्यालय की मिलीभगत से हुआ और जो अधिकारी इसमें शामिल थे वे तथ्य छिपाते रहे। जांच अधिकारी ने कठोर टिप्पणी की और कहा कि यह मामला पीएचक्यू की अनुशासनहीनता का प्रतीक है और गृह विभाग का पीएचक्यू पर नियंत्रण नहीं होने की मिसाल भी पेश करता है।

यूपी के जिस 1966 के शासनादेश का हवाला देकर भर्ती की गई उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि शासन की अनुमति के बगैर ही भर्ती कर ली जाए। पीएचक्यू ने इस शासनादेश की अपने हिसाब से व्याख्या की।
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ऐसे हुआ खुलासा
चूंकि कांस्टेबलों की भर्ती सबइंस्पेक्टर के पदों के विरुद्ध की गई थी इसलिए वे सब नवंबर 2012 में इसी तर्क को लेकर उच्च न्यायालय गए कि उनकी नियुक्ति एसआई के पदों के विरुद्ध हुई है, इसलिए उन्हें वही पद मिलने चाहिएं।

हालांकि न्यायालय ने कड़ी फटकार लगाते हुए उनके इस तर्क को तो खारिज कर दिया, लेकिन अनियमित रूप से हुई भर्ती के लिए सरकार से जवाब तलब कर लिया।

जांच रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है, रिपोर्ट के परीक्षण का काम किया जा रहा है, निष्कर्ष से उच्च स्तर को अवगत कराया जाएगा।
- एमएच खान, प्रमुख सचिव गृह
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