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एक पक्षी, जो बिना घोंसले के बिता देता है पूरी जिंदगी

Tue, 05 Jan 2016 04:10 PM IST
रविकांत डुकलान/ अमर उजाला, कोटद्वार
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जिस तरह इंसान सुखमय जीवन के लिए आलीशान इमारतें बनाता है, उसी प्रकार पक्षी भी अपने लिए अलग-अलग ढंग से तिनके जोड़कर अपना आशियाना तैयार करते हैं, लेकिन पक्षियों में एक प्रजाति ऐसी भी है जो बिना घोंसला बनाएं अपना पूरा जीवन बसर कर देता है, इस पक्षी का नाम है इंडियन नाइटजार, जिसे स्थानीय भाषा में चपका कहते हैं।
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नाइटजार की खासियत यह है कि यह देर शाम अंधेरा होने के बाद पूरी रात सक्रिय रहता है। सुबह होते ही यह फिर से अपने ठिकाने पर चला जाता है। रात में दिखने वाले इस पक्षी को शोरगुल कतई पसंद नहीं है।

यही वजह है कि जंगल में मनुष्य का दखल बढ़ने से यह अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। पक्षी प्रेमी दिनेश कुकरेती का कहना है कि पिछले दस वर्षों में इनकी संख्या में भारी कमी देखी गई है। इक्का-दुक्का स्थानों पर ही रात को इसकी ध्वनि सुनी जाती है।
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क्या है इंडियन नाइटजार की खासियत

यह पक्षी ग्रे, भूरा और कुछ काले रंग का होता है। इसके पंखों के नीचे हल्की सफेद धारी होती है। ज्यादातर यह ऊंचाई वाली चट्टानों, टीलों, पत्थरों और बांझ के झाड़ में अपना ठिकाना बनाता है। आप यदि इसके पास से भी गुजर जाएं तो अमूमन अपने पेड़, पौधों और चट्टान के रंग जैसा होने के कारण नजर नहीं आता।

यह पक्षी साल में केवल दो अंडे देता है। जो हल्के सफेद और हल्के काले धब्बेयुक्त होते हैं। अंडों और बच्चों को कड़ी धूप, बारिश और आंधी से बचाने के लिए यह उनके ऊपर बैठा रहता है।

प्रवास स्थल बदल रहा यह पक्षी
पक्षी विशेषज्ञ दिनेश कुकरेती कहते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में जगह-जगह सड़कों का निर्माण और इससे उत्पन्न शोरगुल, वनों में आग लगने, मानवीय गतिविधियां बढ़ने से इसकी संख्या कम हो रही है। अब कभी-कभार ही पक्षी प्रेमियों को नाइटजार नजर आता है।

120 पक्षियों पर अध्ययन कर चुके हैं गणित के शिक्षक
कोटद्वार भाबर के नंदपुर निवासी शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती वर्तमान में रिखणीखाल स्थित जीआईसी द्वारीपैनो में गणित के सहायक अध्यापक हैं। साप्ताहिक और अन्य अवकाश के दिनों में वह पक्षियों पर अध्ययन करते रहते हैं। कई वर्षों से वह गौरिया समेत कई पक्षियों के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं।
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