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उत्तराखंड: ग्लेशियर, नदियों और पहाड़ों में कचरा डंप करने पर एनजीटी ने सरकार से मांगा जवाब

Wed, 28 Aug 2019 08:13 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : फाइल फोटो
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प्रदेश के ग्लेश्यिरों, नदियों, धाराओं, पर्वतीय क्षेत्र के शहरों और गांवों में जगह-जगह कचरा डंप होने के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है। अधिकरण ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव से कहा है कि वह पूरी स्थिति की रिपोर्ट सामने रखें। अधिकरण ने यह आदेश एक एनजीओ के पूर्व अध्यक्ष डा. अजय रावत की याचिका पर पारित किया है।

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अधिकरण ने वन विभाग को इस मामले की रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। इसी के साथ यह भी तय किया है कि इस मामले को उत्तराखंड में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 को लेकर जारी वाद के दौरान सुना जाएगा। अधिकरण ने वन विभाग, सिंचाई विभाग और शहरी विकास विभाग से भी रिपोर्ट तैयार करने को कहा है और याची को कहा है कि वह साक्ष्य मुख्य सचिव और वन विभाग को उपलब्ध कराए। सुनवाई सितंबर माह में होने की संभावना है।

याची की ओर से अधिकरण के समक्ष उत्तराखंड में जगह-जगह लगे कूड़ें के ढेरों, कार्बेट में प्लास्टिक खा रहे बाघ सहित अन्य कई फोटोग्राफ पेश किए गए थे। याची के अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ के मुताबिक सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव दत्ता ने याची का पक्ष कोर्ट के सामने रखा। वरिष्ठ अधिवक्ता के मुताबिक समूचे पर्वतीय क्षेत्र में अनियंत्रित रूप से जगह-जगह कचरा डंप किया जा रहा है और इस कचरे का निस्तारण नहीं हो रहा है। बाद में इस कचरे में आग लगा दी जाती है। होटल, रिसार्ट, ढाबे इस में बड़ी समस्या के रूप में उभर कर सामने आए हैं। 

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याची की ओर से प्रदेश में बदरीनाथ सहित चारों धामों में लगे कूड़े के ढेरों के फोटोग्राफ अधिकरण को उपलब्ध कराए गए हैं। यह भी कहा है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में टनों प्लास्टिक और अन्य तरह का कूड़ा डंप किया जा रहा है

यह कूड़ा हो रहा है डंप
याची के मुताबिक धामों, नदियों आदि में प्लास्टिक, कांच की बोतलें, एल्म्यूनियम के डब्बे, मेडिकल वेस्ट आदि डंप किया गया। हेमकुंड साहिब में लक्ष्मण गंगा के मुहाने में भी कचरा मिला, उत्तरकाशी में भागीरथी में कचरा डंप कर दिया गया। यही हाल कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों का भी हैं।

एनजीटी इस मामले को लेकर बहुत गंभीर है। कोर्ट को प्रदेश के प्रमुख स्थानों के कई फोटोग्राफ उपलब्ध कराए गए हैं। यह पहली बार है कि प्रदेश की इस ज्वलंत समस्या की ओर एनजीटी का ध्यान आकृष्ट किया गया है।
 -आकाश वशिष्ठ, अधिवक्ता याची
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