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उत्तराखंडः पहाड़ पर खतरे में बच्चों की जान, एक साल में हुई 386 बच्चों की मौत

Fri, 10 Jan 2020 01:06 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हल्द्वानी/पिथौरागढ़/अल्मोड़ा/बागेश्वर/चंपावत/रुद्रपुर

सार

  • मंडल के सबसे बड़े अस्पताल एसटीएच में 218 नवजात बच्चों ने तोड़ा दम
  • जरूरत के मुताबिक नहीं है सुविधाएं, सीमित जगह एसएनसीयू की सुविधा
  • अल्मोड़ा में एसएनसीयू के नाम पर चार बेड पर है वार्मर, वेंटीलेटर नदारद
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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विस्तार
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राजस्थान और गुजरात में नवजात बच्चों की मौत के मामले स्वास्थ्य सेवाओं की हालत पर चिंता में डालने वाले तो हैं ही कुमाऊं में भी स्थिति जुदा नहीं है। नैनीताल जिले में अकेले हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल (एसटीएच) में 218 बच्चों की मौत का आंकड़ा मिला दिया जाए तो कुमाऊं में एक साल के भीतर 386 बच्चों की मौत हुई है।

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मंडल के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में एसएनसीयू की सुविधा तक नहीं है। मंडल के सबसे बड़े अस्पताल एसटीएच में 20 बेड का एसएनसीयू है और मात्र चार बेड पर ही वेंटीलेटर की सुविधा है।
हल्द्वानी के महिला अस्पताल में भी एसएनसीयू (स्पेशल न्यूनेटल केयर यूनिट) की सुविधा नहीं है। यहां पिछले एक साल में 4551 बच्चों का जन्म हुआ, जबकि तीन बच्चे मृत पैदा हुए।
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 अल्मोड़ा में बाल रोग विशेषज्ञ के पद तो हैं लेकिन जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों में एसएनसीयू और वेंटीलेटर की सुविधा ही नहीं है। चार बेड का वार्मर जरूर है। एक साल में जिले में आठ नवजात बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें पांच रानीखेत क्षेत्र के हैं। जिला महिला अस्पताल में 24 प्री मैच्योर डिलीवरी हो चुकी हैं। वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीति पंत ने बताया कि तीन नवजातों की जन्मजात विकृति के कारण भी मौत हुई है।

उधर, चंपावत जिले में दो एसएनसीयू है। 2019 में चंपावत जिले में कुल 2408 शिशुओं ने जन्म लिया। इस दौरान 27 शिशुओं की जान गई। पिथौरागढ़ जिला महिला अस्पताल में एसएनसीयू में चार बेड हैं। जिले में पिछले एक साल के भीतर 13 प्री मैच्योर शिशुओं की मौत हुई है।

हर गोविंद पंत जिला महिला अस्पताल पिथौरागढ़ के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ और पीएमएस डॉ. जेएस नबियाल ने बताया कि प्री मैच्योर शिशुओं का विकास नहीं होता है। खासतौर पर उनके फेफड़े विकसित नहीं होते हैं। ऐसे शिशुओं के उपचार की यहां पर कोई व्यवस्था नहीं है।

बागेश्वर जिले में एक भी एसएनसीयू में वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है। जिला अस्पताल में चार बेड के एसएनसीयू में सिर्फ वार्मर की सुविधा है। बदहाल व्यवस्था का आलम यह है कि पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह की पत्नी तक को यहां से रेफर करना पड़ा था। बागेश्वर जिले में 31 नवजात बच्चों की मौत हुई। पारदर्शी व्यवस्था न होने से जच्चा-बच्चा की मृत्यु संख्या के औसत की रिपोर्टिंग भी पूरी नहीं हो पाती है। इस कारण हकीकत और सरकारी दावों में बहुत अंतर है।

विभागीय अधिकारियों के माध्यम से चार बेड पर वेंटिलेटर लगाने या छह बेड का नया कमरा बनाने का प्रस्ताव भेजा गया है। ऊधम सिंह नगर जिले में एक अप्रैल से 31 दिसंबर तक 89 नवजातों की मौत हो चुकी है। जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 147 थी। जिले में जवाहर लाल नेहरू जिला चिकित्सालय, एलडी भट्ट संयुक्त चिकित्सालय काशीपुर, नागरिक चिकित्सालय खटीमा समेत कहीं भी वेंटीलेंटर युक्त एसएनसीयू की व्यवस्था नहीं है। एसएनसीयू की सुविधा के नाम पर सिर्फ वार्मर उपलब्ध है।

रुद्रपुर स्थित जिला अस्पताल पर प्रसव के लिए रुद्रपुर, किच्छा, शांतिपुरी, गदरपुर, दिनेशपुर आदि क्षेत्रों के गरीब तबके की गर्भवती महिलाएं निर्भर हैं। यहां 12 बेड का एसएनसीयू है। जिले में एक अप्रैल 2019 से 31 दिसंबर तक 19 हजार, 656 बच्चों का जन्म हुआ। इनमें 89 नवजातों की प्रसव के बाद मौत हो चुकी है।

जवाहर लाल नेहरू जिला चिकित्सालय के प्रबंधक अजयवीर सिंह चौहान कहते हैं कि जिला अस्पताल में वेंटीलेटर की सुविधा नहीं है। इस बारे में जब सीएमओ डॉ. शैलजा भट्ट से जानकारी लेनी चाही तो उन्होंने एक बैठक का हवाला देते हुए जानकारी देने से इंकार कर दिया।

नवजातों की मौत की बड़ी वजह एसएनसीयू की कमी 

चंपावत जिले के सेवानिवृत्त सीएमओ और बेस अस्पताल में बतौर बाल रोग विशेषज्ञ तैनात रहे डॉ. मदन बोहरा ने बताया कि नवजात बच्चों की मौत की कई वजह हैं इनमें एक बड़ी पर्वतीय जिलों समेत तराई के कई इलाकों में पर्याप्त संख्या में बाल रोग विशेषज्ञ का नहीं होना है। बाल रोग विशेषज्ञ नहीं होने से नवजातों की बीमारी सही समय पर पता नहीं चल पाती और हल्द्वानी या हायर सेंटर ले जाने में देरी के चलते उनकी मौत हो जाती है। इसके अलावा दूसरी बड़ी वजह स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) का इंतजाम नहीं होना भी है। 
 
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कहां कितनी मौतें

नैनीताल (एसटीएच) : 218
बागेश्वर   : 31
चंपावत   : 27
ऊधमसिंह नगर : 89
पिथौरागढ़ : 13
अल्मोड़ा : 08

कुमाऊं मंडल में शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए नर्सों व एएनएम को सुरक्षित प्रसव कराने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अब तक कई नर्सों और एएनएम को यह प्रशिक्षण दिया जा चुका है। आशा वर्कर्स के माध्यम से गांवों में गर्भवती महिलाओं को संस्थागत केंद्रों जैसे सरकारी अस्पतालों में अथवा प्रशिक्षित नर्सों और एएनएम से ही प्रसव कराने के लिए जागरूक किया जा रहा है। ताकि प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा दोनों के जीवन पर किसी तरह का कोई खतरा न हो। एसएनसीयू पहाड़ों के जिला अस्पताल में नहीं है। एसएनसीयू के लिए प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है। प्रस्ताव को हरी झंडी अगर मिलती है तो एसएनसीयू बनाए जाएंगे। - डॉ.. संजय साह, प्रभारी निदेशक स्वास्थ्य (कुमाऊं मंडल)

20 बेड के एसएनसीयू में चार वेंटीलेटर हैं। अगले वित्तीय वर्ष में शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा कि पांच वेंटीलेटर और बढ़ाएं जाएं। वेंटीलेटर बढ़ने के बाद इलाज के नवजात और बच्चों को बेहतर सुविधा मिल पाएगी। - डॉ. सीपी भैसोड़ा प्राचार्य राजकीय मेडिकल कॉलेज

नैनीताल जिले में अकेले हल्द्वानी स्थिति मेडिकल कॉलेज में पूरी सुविधाओं से लैस एसएनसीयू की सुविधा है। शेष किसी अस्पताल में यह सुविधा नहीं है। हल्द्वानी स्थिति महिला अस्पताल में एसएनसीयू की सुविधा उपलब्ध कराई जा चुकी है लेकिन स्टाफ  की कमी की वजह से अभी इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। 
- डॉ. टीके टम्टा, डिप्टी सीएमओ जिला अस्पताल नैनीताल
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