राजधानी देहरादून में जमीन पर कब्जा करने के लिए भूमाफिया नए-नए फंडे अपना रहे हैं।
आजादी के पहले के दस्तावेजों में हेराफेरी कर जमीन हथियाने की कोशिशें की जा रही हैं। ‘सहारनपुरिया’ गिरोह लोगों को ऐसे पुराने रिकॉर्ड बेच रहा है। इस फर्जीवाड़े की आड़ में कब्जे का नया खेल चल रहा है। ऐसी शिकायतें जिला प्रशासन को मिलने लगी हैं।
देहरादून मेरठ कमिश्नरी में आता था
पहले देहरादून मेरठ कमिश्नरी में आता था और यह सहारनपुर की तहसील हुआ करती थी। तब सारे रिकॉर्ड सहारनपुर में रखे जाते थे। आजादी के बाद बड़े पैमाने पर घाटी में फसाद हुए, जिसमें बहुत लोग मारे गए।
इस दौरान बहुत से लोग भाग गए, जिनका अब अता-पता नहीं है। देहरादून जिला बना, फिर अलग प्रांत बन गया। लेकिन बहुत से रिकॉर्ड अब भी सहारनपुर में पड़े हैं।
फसाद में जो लोग मरे या भाग गए उनकी जमीनें ग्राम समाज में आ गईं। अब जब दून में जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं तो बरसों पुराने ये रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। कर्मचारियों की मिलीभगत से गिरोह ऐसे दस्तावेजों के जरिए मोटी कमाई करने में जुट गया है।
पुराने रिकॉर्ड के आधार जमीनों पर जमा रहे हक
इन्हीं दस्तावेजों से भूमाफिया, नेता, अधिकारियों और कर्मचारियों के गठजोड़ से जमीन पर कब्जे का नया फंडा अपना रहे हैं। लोग सहारनपुर से पुराने रिकॉर्ड बनवाते हैं और उसी आधार पर यहां जमीनों पर हक जमा लेते हैं।
सूत्रों का कहना है कि जो जमीन ग्राम समाज, नगर निगम और राजस्व विभाग के पास है उस पर कब्जे में ज्यादा विवाद नहीं होता। बखेड़ा तो वहां खड़ा होता है जहां किसी व्यक्ति ने घर बना लिया है और अब उससे जगह छोड़ने के लिए कहा जा रहा है।
ऐसे कई पीड़ित शिकायती पत्र लेकर नेताओं और अधिकारियों से गुहार लगाते फिर रहे हैं। जमीन पर कब्जे के एक मामले में केंद्रीय मंत्री हरीश रावत ने भी जिलाधिकारी को पत्र लिखा था। इसके अलावा लोग जिलाधिकारी कार्यालय में शिकायती पत्र दे रहे हैं।
सूत्रों ने बताया कि बहुत से रिकॉर्ड सहारनपुर से नहीं आए हैं। इस संबंध में सहायक अभिलेख अधिकारी (एआरओ) रामजी शरण ने बताया कि पुराने रिकॉर्ड जहां के होते हैं वहीं रहते हैं।