यूं तो नेताजी व्यापारियों के बड़े खैर-ख्वाह होने का दावा करते हैं। भाषण में पुलिस, प्रशासन के लिए उनके मुंह से कभी सीधी बात नहीं निकलती।
लेकिन उनकी गतिविधियां उसी वक्त शबाब पर होती हैं, जब उनके अपने किसी निजी हित पर आंच आ रही हो। शुरू-शुरू में नेताजी के ताव दिलाने पर दूसरे व्यापारी भी अनचाहे मुद्दों पर उनके साथ लग जाते थे।
लेकिन जल्द ही नेताजी की स्वार्थ में डूबी गतिविधियों को वह सूंघ गए। अब नेताजी बुलाते भी हैं तो ज्यादा लोग पास नहीं फटकते।
केवल वही आते हैं, जिन्हें नेताजी ‘खाने-पीने’ के झांसे में फांस पाते हैं। बेचारे नेताजी अपनी समस्या किसी से शेयर भी नहीं कर पा रहे। डर है, कहीं लोग हंस न दें।