भारत और नेपाल के बीच 1991 की संधि के तहत बनने वाली सड़क ही गलत बना दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मई दौरे को देखते हुए इस सड़क को रिकार्ड समय में पूरा करने की कोशिश की गई थी। करीब एक करोड़ रुपये खर्च होने के बाद नेपाल की आपत्ति के बाद मामला खुलकर सामने आया है। अब 21 अगस्त को विदेश मंत्रालय की बैठक में इस सड़क का मुद्दा उठने की संभावना है।
भारत-नेपाल के बीच टनकपुर पावर हाउस निर्माण के दौरान 1991 में हुई संधि में टनकपुर बैराज से ब्रह्मदेव (नेपाल) तक 12 मीटर चौड़ी सड़क का निर्माण होना था। लंबे समय तक यह मामला लटका रहा। पिछले साल नेपाल ने इस मुद्दे को भारत के समक्ष उठाया और यह साफ कहा कि पुरानी संधियों पर अमल होने तक नई संधि नहीं की जाएगी।
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संधि की शर्त पर अमल का आदेश जारी किया। मई माह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल दौरे से ठीक तीन दिन पहले ही अधिकारियों ने इस सड़क को बनाने में एड़ी चोटी तक का जोर लगा दिया। 24 घंटे के अंदर ही वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। इसके बाद एक अगस्त से 1.2 किलोमीटर सीसी रोड का निर्माण शुरू हुआ।
सड़क का निर्माण शुरू होते ही नेपाल की आपत्ति भी खुलकर सामने आ गई। नेपाल ने पहले सीमा विवाद का मामला बताकर नेपाल छोर में 200 मीटर सड़क का निर्माण कार्य रुकवाया था। अब नेपाल ने इस सड़क के समरेखण पर ही आपत्ति जताई है। नेपाल के एक अधिकारी के मुताबिक संधि में टनकपुर बैराज से नेपाल तक सिंचाई के लिए नहर भी बन रही है। यह सड़क भी नहर के किनारे ही बनाई जानी थी। इसके विपरीत टनकपुर बैराज से ब्रह्मदेव तक नया समरेखण तय करते हुए सड़क का निर्माण किया जा रहा है। कार्यदायी संस्था आरजीबी कंपनी के निदेशक मनोज चौहान के मुताबिक करीब एक करोड़ रुपये सड़क निर्माण पर खर्च किया जा चुका है।