हालांकि सितारगंज के भाजपा विधायक सौरभ बहुगुणा की राय इससे थोड़ा जुदा है। वह कहते हैं, वो उत्तराखंड में 1965-75 के बीच विस्थापित हुए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें यहां बसाया। उन्हें जमीनों के पट्टे दिए। अब तो उन्हें भूमिधरी का अधिकार भी मिल चुका है।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के आदेश के बाद अब उन्हें जो प्रमाणपत्र जारी हो रहे हैं, उनमें पूर्वी पाकिस्तान नहीं लिखा जा रहा है। कोई संदेह नहीं कि वे भारतीय नागरिक हैं। बहुगुणा की मानें तो कुछ तत्व उन्हें रोहिंग्या मुसलमानों से जोड़कर गलत संदेश दे रहे हैं, जबकि उनका रोहिंग्याओं से कोई सरोकार नहीं है।’
बांग्ला समुदाय से जुड़े लोगों की चिंता दूसरी है। उनका कहना है कि शरणार्थी होने के समय जो प्रमाणपत्र उनके पास है, असम में उसे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में नाम दर्ज कराने का आधार नहीं माना गया। प्रदेश में 1971 से पहले जितने बांग्लादेश से शरणार्थी आए उन्हें अपने भूमि, स्कूल से जुड़े सभी प्रमाणपत्र राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए अप्रैल 2020 तक जमा करने हैं। एडवोकेट जीवन राय कहते हैं, मुफिलिसी में हजारों शरणार्थियों ने फूस की झोपड़ियों में जीवन गुजारा।
गर्मियों में झोपड़ियां खाक हो जाती थीं। इन आगजनी की घटनाओं में उनके प्रमाण पत्र भी जल गए। चिंता ऐसे नागरिकों को लेकर है कि उनके भविष्य का क्या होगा, जबकि वे तीन पीढ़ियों से राज्य में रह रहे हैं और उनके बच्चे और परिवार वाले सरकारी नौकरियों तक में हैं। उनकी मानें तो पांच सितंबर को दिल्ली के जंतर मंतर में राष्ट्रीय संगठन की बैठक होगी, जिसमें सभी बांग्लादेशी शरणार्थियों की नागरिकता से संबंधित मसलों पर रणनीति बनाई जाएगी।