मां नंदा की मायके से ससुराल यानी कैलास के लिए विदाई की यात्रा (राजजात) शुक्रवार को 12वें दिन मुंदोली से वाण गांव पहुंची। यात्रा का यह अंतिम आबाद पड़ाव होने के साथ-साथ नंदा के धर्मभाई लाटू का गांव भी है।
यहां से आगे उच्च हिमालयी क्षेत्र होमकुंड तक यात्रा के सभी पड़ाव निर्जन हैं। शनिवार सुबह यात्रा वाण से अगले पड़ाव गैरोली पातल के लिए निकलेगी, जो करीब 8 किमी दूर है। सीधी खड़ी चढ़ाई अब नंदा के भक्तों की परीक्षा लेगी। मान्यता है कि वाण से लाटू देवता यात्रा की अगुवाई करते हैं।
लाटू का गांव वाण शुक्रवार को 14 साल बाद देव मिलन का साक्षी बना। भगवती नंदा की डोली के साथ-साथ कुमाऊं और गढ़वाल के तमाम देवी-देवताओं की छंतोलियों और निशान ने यहां डेरा डाला। लाटू देवता के मंदिर के कपाट खोल दिए गए।
गैरोली में खुले आसमान के नीचे विश्राम करेगी नंदा
मुंदोली से सुबह दस बजे भगवती नंदा वाण के लिए रवाना हुईं। बीच में हिमालयी क्षेत्र की संकरी घाटियों के बीच से होते हुए नंदा ने पुराने और पारंपरिक रास्ते से ही सफर तय किया। सवा चार बजे नंदा वाण गांव पहुंचीं, तो पूरी घाटी ढोल-दमाऊं और शंख की ध्वनि से गूंज उठी।
वाण से यात्रा अब अपने दूसरे ही रूप में आगे बढ़ेगी। करीब ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर बसे इस गांव के बाद यात्रा और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जाएगी। यहां से रहस्य, रोमांच की एक नई दुनिया भी शुरू हो रही है। मां नंदा अब हिमालय के उस क्षेत्र की ओर निकलेंगी, जो आध्यात्मिक शक्ति के साथ ही खतरों से जूझने के लिए नंदा के भक्तों को तैयार करता है।
शनिवार को मां नंदा यात्रा के पहले निर्जन पड़ाव गैरोली पातल में खुले आसमान के नीचे विश्राम करेंगी। यहां नंदा के भक्त पूरी रात देवी का जागरण करते हैं। गैरोली पातल का भी इस यात्रा में विशेष महत्व है। मान्यता है कि यहां पर मां नंदा ने राक्षसों का वध किया था।
वाण का है खास महत्व
नंदा की राजजात में वाण गांव का विशेष महत्व है। यह यात्रा का अंतिम बस्ती पड़ाव है। यहां से यात्रा निर्जन पड़ावों के लिए शुरू हो जाती है। गांव में करीब तीन सौ परिवार रहते हैं। इस गांव का भूम्याल देवता लाटू है।
लाटू मंदिर के कपाट वर्षभर में एक बार ही खुलते हैं। मान्यता है कि लाटू मंदिर के अंदर हीरा-मोती हो सकते हैं जिनकी चमक से आंखों की रोशनी जा सकती है या फिर जहरीले नाग हो सकते हैं।
इसलिए पुजारी आंख पर पट्टी बांधकर पूजा करता है। इस मंदिर में महिलाओं का जाना वर्जित है। श्रद्धालु भी दस मीटर दूरी से दर्शन करते हैं।
वाण में एशिया का सबसे बड़ा पेड़
लाटू देवता के मंदिर में सुराई का पेड़ एशिया का सबसे बड़ा और पुराना पेड़ है। इस पेड़ का व्यास 15 मीटर से अधिक है। पेड़ की पत्तियों को यहां पहुंचने वाले भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
लाटू को बनाया था धर्मभाई
लाटू देवता को लेकर मान्यता है कि एक समय कन्नोज से नंदा भक्त एक ब्राह्मण हिमालय यात्रा के दौरान वाण पहुंचा था। इस दौरान उसे प्यास लगी। उसने एक महिला से पानी मांगा, तो महिला ने समीप रखे दो बर्तनों की तरफ इशारा किया।
इन बर्तनों में एक में पानी और दूसरे में छंग (मदिरा) था, लेकिन उसने भूलवश छंग पी ली। उसे इसका बोध हुआ तो, उसने अपने दांतों से अपनी जीभ काट ली, जिससे उसकी मौत हो गई।
कहा जाता है कि ग्रामीणों ने उसका शव एक ऊंचे स्थान पर रख दिया और उसके क्रियाकर्म की तैयारी करने लगे। जब वह लौटे, तो शव वहां से गायब था।
मान्यता यह भी है कि नंदा देवी उसकी आत्मा को हिमालय ले गईं और उसे अपना धर्म भाई बनाया। उसने नंदा को वचन दिया कि वह वाण गांव से उसकी हिमालय यात्रा की अगुवाई करेगा।