शिवधाम कैलास के लिए चली नंदा अब हिमालय क्षेत्र में पहुंच चुकी है। ससुराल क्षेत्र अब कुछ ही दूर है। रविवार की शाम नंदा गैरोली पातल से होते हुए अपने दूसरे निर्जन पड़ाव बेदनी पहुंचेगी। बेदनी को पहली बार 20वां पड़ाव बनाया गया है।
बेदनी में सोमवार को नंदा सप्तमी की पूजा होगी। हर वर्ष होने वाली मां नंदा की लोकजात और 12 वर्ष में होने वाली राजजात में बेदनी का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां पर नंदा भक्त और राजकुंवर कुंड में अपने पित्रों को तर्पण देते हैं।
कुंड में हिमालय का संपूर्ण प्रतिबिंब दिखाई देता है। मान्यता है कि यहां पर मां पार्वती के पुत्र भगवान गणेश जी ने वेद लिखे थे, इसलिए यहां का नाम बेदनी है।
समुद्रतल से 3450 सौ मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की वादियों में कई मील तक खुले स्थान के रूप में बिखरा बेदनी बुग्याल के मध्य कुंड कई प्राचीन किवदंतियों को संजोए है।
बेदनी के साथ जुड़ी हैं कई कथाएं
मान्यता है कि नंदा ने महिषासुर मर्दिनी के रूप में महाकाली बनकर रक्तबीज दैंत्य का वध किया था। तब भगवान शिव ने उन्हें इसी कुंड में स्नान कराया था, जिससे वे पुन: महागौरी के रुप में आ गई थी।
मान्यता यह भी है कि 12 वर्ष या उससे अधिक समय में होने वाली नंदा की कैलास यात्रा में बेदनी पहुंचने पर भगवान शंकर और महागौरी का विवाह संस्कार किया जाता है।
एक सूत (धागे) को फेर कर सात फेरे लगाए जाते हैं। बेदनी प्रकृति की अनुपम धरोहर के रूप में भी विख्यात है, लेकिन बेदनी कुछ समय से प्रकृति की मार झेल रहा है। वर्ष 2011 से भूस्खलन से बुग्याल कई जगहों पर दरक रहा है। कुंड के बाहरी ओर भी गहरी दरारें पड़ी हैं, जो लगातार बढ़ रही हैं। कुंड से पानी रिस रहा है।
कुंड को लेकर यह है मान्यता
ऐसी मान्यता है कि 9वीं सदी में कन्नौज के राजा जसधवल अपनी गर्भवती पत्नी बल्लभा सहित पूरी सेना के साथ हिमालय यात्रा पर आए थे।
मौसम की खराबी और अन्य कारणों से यात्रा में शामिल कान्यकुब्ज गर्ग गोत्री ब्राह्मण और अन्य जातियों के यजमान थकान से बेदनी कुंड के समीप ही रुक गए।
लेकिन राजा नहीं रूका और सेना के साथ आगे बढ़ गया। पातरनचौणियां और रुपकुंड जाते-जाते राजा पूरी सेना के साथ काल का ग्रास बन गया।
मान्यता है कि कान्य कुब्ज गर्ग गोत्री ब्राह्मण और यजमानों ने स्वयं के सकुशल होने पर बेदनी कुंड में महागौरी, महाकाली और भगवान शिव की मूर्तियां स्थापित की।