सुहाने मौसम के बीच पूजा-अर्चना के साथ चमोली जिले में नौटी से सोमवार को श्रीनंदा राजजात-2014 का श्रीगणेश हुआ।
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मां नंदा को मायके से ससुराल यानी कैलास विदा करने की 14 साल बाद हो रही यात्रा को लेकर भक्तों में आस्था, उल्लास और भावुकता की त्रिवेणी प्रवाहमान दिखी।
नंदा मंदिर परिसर में राजजात समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर के नेतृत्व में राजछत्र और चौसिंग्या खाडू के साथ श्रद्धालुओं ने दिन में 11.35 बजे नौटी से पहले पड़ाव ईड़ा बधाणी के लिए प्रस्थान किया।
नंदा राजजात यात्रा के मुख्य संरक्षक और राज्यपाल अजीज कुरैशी ने यात्रा का शुभारंभ करते हुए सफलता की कामना की।
नंदा के प्रति अगाध आस्था
अनछुए पहाड़ों की गोद में बसे गांव सदियों से अपने पुराने अंदाज में जी रहे हैं। मां नंदा के प्रति इनकी अगाध आस्था है।
इन भोले-भाले ग्रामीणों की भेंट स्वीकार करती मां नंदा सोमवार को नौटी से निकलकर सबसे पहले सिलंगी में अपनी बहन उफरांई से मिलीं। वचन निभाने के लिए ऊंचे पहाड़ों की तरफ निकलने की बजाय नंदा कर्णप्रयाग के पास ईड़ा बधाणी पहुंच गईं।
दस किलोमीटर के इस पहाड़ी रास्ते में छह साल के बच्चे से लेकर 80 साल की बुजुर्ग महिलाओं ने नंदा के साथ सफर तय किया।
नंदा भले ही ससुराल के लिए निकली हों पर गांव, पहाड़ी रास्तों में महिलाओं की भेंट स्वीकार करती नंदा के सामने पहाड़ की महिलाओं का मायके के प्रति अटूट प्रेम उभर कर सामने आया।
सिलंगी में उफरांई के साथ गले मिलकर नाचती नंदा का मायके से निकलने का दर्द गांव की महिलाओं के गीतों में जब-तब उन शांत वादियों में गूंजता रहा।
शिव का धाम कष्टों से भरा
महिलाओं के मुंह से लय के साथ फूट रहे नंदा के जागर में ससुराल के कठोर जीवन, वहां के कष्ट नंदा को भेंट देती महिलाओं के सुरों में छलक आया।
नंदा का मायका खूब भरा-पूरा है पर शिव का धाम उतने ही कष्टों से भरा। नौटी से करीब चार किलोमीटर की सीधी चढ़ाई चढ़ कर नंदा जब बगरखाल पहुंचीं तो छातौली गांव की महिलाओं के लिए नंदा को विदा करने की बेला थी।
नौटी से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर के छातौली की महिलाओं ने नंदा को विदा किया। यहां से उनकी वापसी का समय था। अब बारी सिलंगी की थी।
बगरखाल से करीब दो किलोमीटर की दूरी के गांव सिलंगी में नंदा की बहन उफरांई देवी का मंदिर है। यहां नंदा उफरांई से मिलीं तो पूरा गांव भाव विभोर था। जागर गूंज रहे थे।
‘वीर’ जैसे अलग ही दुनिया में
महिलाएं गा रही थी-स्वामी शिव मुझे मायके जाने थे। शिव ने डांटा- क्या रोज सुबह शाम मायके की बात करती हो। नंदा ने कहा-मायके से मैं तुम्हारे लिए बढ़िया खाने-पीने का सामान लाऊंगी। शिव बोले-ठीक है तुम्हारा भाई न्यूता (न्योता) लेकर आएगा तो जाना।
ससुराल जा रही नंदा अपने मायके को नहीं भूल पा रही हैं। मां ने ससुराल वालों के लिए बढ़िया अरसे बनाए हुए हैं।
उफरांई की देवी जिस महिला पर है उसका नाच थमने का नाम नहीं ले रहा है। नंदा की रक्षा के लिए साथ मेंनिकला ‘वीर’ जैसे अलग ही दुनिया में है। सिलंगी में देवता धरा पर मानवों के बीच में उतर आए हैं। यह उनकी दुनिया, उनका क्षेत्र है। पुरुष पीछे हैं। महिलाएं आगे।
देवी के साथ चल रहे चौसिंग्या मेढ़े (खाड़ू) को छूने, उसे भेंट देने की होड़ मची है। महिलाओं का आंचल पसरा है। ढोल, दमाऊं, रणसिंघा, भंकोरू की गूंज के बीच अक्षत के दाने आंचल में गिर रहे हैं। नंदा की यात्रा (राजरात) शुरू हो चुकी है।
नंदा की यह यात्रा इसके बाद चौंडली, हिलोली होते हुए ईड़ा बधाणी शाम को सात बजे तक पहुंच चुकी है। रोड हेड के इस गांव में देवी रात को रुकेंगी।
ससुराल जाते समय नंदा का इस गांव के लोगों ने खूब स्वागत किया था। नंदा ने उस समय गांव के प्रधान जमन सिंह जदोड़ा को वचन दिया था कि ससुराल जाते समय हर बार आऊंगी। देवी ने इस बार भी जमन सिंह के गांव जाकर अपना वचन निभाया।