लेकिन, 26 सितंबर 2016 को उसके पिता की मौत हो गई थी। पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए उसने जिलाधिकारी हरिद्वार के समक्ष पैरोल के लिए आवेदन किया था।
लेकिन जिलाधिकारी ने उसका आवेदन खारिज कर दिया था। याचिका में कहा गया कि तीन अक्तूबर को उसने पुन: अपने पिता की तेरहवीं और पगड़ी में मात्र 6 घंटे शामिल होने की अनुमति मांगी।
लेकिन, उसे इसके लिए भी पैरोल नहीं दिया गया। हरिद्वार के तत्कालीन जिलाधिकारी के इस रवैये के खिलाफ कैदी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। पक्षों की सुनने के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इसे गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन जिलाधिकारी हरिद्वार को निर्देश दिए हैं कि वे कैदी को हुई मानसिक व्यथा के हर्जाने के रूप में उसे एक लाख रुपये का भुगतान करें।