इस संबंध में सरकार की ओर कोर्ट को बताया गया कि पत्रकारों के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई गई हैं, जिनके लिए पांच करोड़ रुपये भी जारी किए गए हैं। कोर्ट को बताया गया कि पत्रकार की मौत या शारीरिक नुकसान होने पर सरकार पांच लाख रुपये और विशेष परिस्थितियों में दस लाख रुपये देती है।
बताया गया कि 60 वर्ष से अधिक उम्र के सात पत्रकारों को इसी मद से वृद्ध पेंशन दी जा रही है। पत्रकारों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए 25 लाख रुपये का बजट रखा गया है। मान्यता प्राप्त पत्रकारों को उत्तराखंड रोडवेज की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा भी दी जाती है।
दोनों पक्षों को सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को आदेश दिया कि वह द वर्किंग जर्नलिस्ट एंड न्यूज पेपर इंप्लाइज एक्ट-1955 के तहत पत्रकारों के श्रम कानून को लागू कराए। कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 9 के तहत केंद्र सरकार जरूरत पड़ने पर एक वेज बोर्ड बनाए।
कोर्ट ने कहा कि 11 नवंबर 2011 के नोटिफिकेशन के तहत पत्रकारों की स्थिति में सुधार लाए। राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह वृद्ध पत्रकारों की पेंशन को खर्चों के अनुरूप बढ़ाए। कोर्ट ने सरकार से कहा कि वह आंध्र प्रदेश और ओडिशा की तर्ज पर पत्रकारों के लिए वेलफेयर फंड नियमावली बनाए।
कोर्ट ने सुझाव देते हुए कहा कि राज्य सरकार के अपर मुख्य सचिव और सूचना निदेशक उत्तर प्रदेश सरकार की तर्ज पर पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य और पेंशन स्कीम अलग मद में बनाएं। राज्य सरकार से कहा कि वह चाहे तो पत्रकारों को हाउसिंग फ्लैट्स स्कीम या सरकारी हाउसिंग स्कीम में आरक्षण दे सकती है।