हाईकोर्ट ने गंगा, यमुना व सहायक नदियों काे जीवित व्यक्ति का दर्जा तथा उसके अनुरूप अधिकार प्रदान किए जाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आठ सप्ताह के भीतर गंगा मैनेजमेंट बोर्ड बनाने के भी निर्देश दिए हैं।
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हाईकोर्ट का मानना है कि गंगा और यमुना बेहद पवित्र नदियां है, जो हिंदुओं द्वारा पूजी जाती हैं, लेकिन इनका अस्तित्व खतरे में है। इनको बचाने के लिए असाधारण कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
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कोर्ट ने न्यूजीलैंड की नदी व्हांगानुई को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिए जाने का हवाला देते हुए गंगा, यमुना, उनकी सहायक नदियों व संबंधित जल स्रोतों को भी जीवित व्यक्ति का दर्जा दिए जाने के निर्देश दिए।
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इसके अलावा कोर्ट ने उत्तराखंड तथा उत्तरप्रदेश के बीच लंबित विभिन्न परिसंपत्तियों का निपटारा आठ सप्ताह के भीतर करने तथा देहरादून के जिलाधिकारी को ढकरानी की शक्तिनहर से सात दिन के भीतर अतिक्रमण हटाने अन्यथा डीएम को निलंबित करने के आदेश दिए हैं।
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हाईकोर्ट ने एक अभूतपूर्ण निर्णय में गंगा, यमुना व सहायक नदियों तथा उनसे जुडे़ जल स्रोतों को जीवित व्यक्ति का दर्जा देने के आदेश दिए। कोर्ट ने मुख्य सचिव उत्तराखंड, महानिदेशक नमामी गंगे और महाधिवक्ता को इन नदियों की बेहतरी और इनके स्वास्थ्य के रखरखाव के लिए बतौर अभिभावक जिम्मेदारी दी है।
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कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि दिसंबर 2016 में दिए गए तत्संबंधी आदेश पर अब तक कार्रवाई नहीं हुई, जिसमें गंगा प्रबंधन बोर्ड बनाने तथा गंगा नदी बेसिन से खनन को प्रतिबंधित करने संबंधी आदेश दिए गए थे।
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केंद्र की ओर से उपस्थित सीनियर ज्वाइंट कमिश्नर मिनिस्ट्री ऑफ वाटर रिसोर्स एंड गंगा रिज्यूविनेशन वीरेंद्र शर्मा ने कोर्ट को बताया कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड ने गंगा मैनेजमेंट बोर्ड गठन के लिए केंद्र सरकार ने कोई सहयोग नहीं किया।
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इन सरकारों ने एक एक पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति करनी थी और केंद्र सरकार द्वारा अध्यक्ष की नियुक्ति की जानी थी, जो अभी तक नहीं की गई है। सोमवार को वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मोहम्मद सलीम ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि शक्तिनहर ढकरानी (यमुना नदी) में अतिक्रमण किया है, उन्हें वहां से हटाया जाए।
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याचिका में कहा कि उत्तराखंड व उत्तरप्रदेश की नदियों व परिसंपत्तियों का बंटवारा किया जाए। जिस पर न्यायालय ने 5 दिसंबर 2016 को आदेश दिया था कि तीन माह के भीतर गंगा मैनेजमेंट बोर्ड का गठन करने व संपत्तियों का बंटवारा करने के आदेश दिए थे।
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साथ ही न्यायालय ने 12 सप्ताह के भीतर अतिक्रमणकारियों को हटाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने गंगा नदी में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एमसी पंत की ओर से कोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि केंद्र सरकार द्वारा गंगा मैनेजमेंट बोर्ड का गठन नहीं किया गया है
और न ही संपत्तियों का बंटवारा हुआ और न ही अतिक्रमण को हटाया गया है। पूर्व में कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के बाद जल संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों को उपस्थित रहने के लिए कहा था।