हाइकोर्ट ने एसिड अटैक मामलों को गंभीरता से लेते हुए निचली अदालतों को ऐसे मामलों में तीन माह के भीतर फैसला देने और सरकार को क्रिमिनल इंज्युरी कंपनसेशन बोर्ड का गठन चार सप्ताह में करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने खुले में ऐसिड की बिक्री को प्रतिबंधित करते हुए सरकार को आदेशित किया है कि एसिड अटैक मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होते ही पीड़ित को तत्काल एक लाख रुपये मुआवजा और प्रतिमाह सात हजार रुपये दिया जाए।
कोर्ट ने अस्पतालों में एसिड अटैक पीड़ितों के लिए प्राइवेट वार्ड बनाने को कहा है। निजी अस्पतालों को आदेशित किया है कि वे एसिड पीड़ित व्यक्ति को निशुल्क उपचार दें। न्यायालय ने सभी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को सात दिन के अंदर जांच पूरी करने का निर्देश दिया। निचली अदालत को तीन माह में फैसला देने को कहा।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को ऐसिड की बिक्री नहीं की जा सकती और जो एसिड का थोक व्यापारी है, वो केवल अस्पताल, फार्मेसी या दूसरे लाइसेंस होल्डर, जो इसका व्यापार करता हो, उसे दे सकता है।
कोर्ट ने तीन माह के भीतर हर जिला और संयुक्त अस्पताल में बर्न वार्ड बनाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि छेड़खानी, पीछा करने, यौन प्रताड़ना के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो। वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
मामले के अनुसार रुड़की निवासी कुंवर सिंह ने 18 दिसंबर 2009 को रुड़की थाने में एक रिपोर्ट दर्ज कर कहा था कि उसकी पुत्री जब ट्यूशन पढ़कर घर आ रही थी तो अभियुक्त आजम ने उस पर एसिड छिड़क दिया। इस प्रकरण पर निचली अदालत ने पांच अगस्त 2010 को निर्णय देते हुए साक्ष्य के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया था। निचली अदालत के इस आदेश के विरुद्ध सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।