मनोवैज्ञानिक डॉ. नेहा शर्मा का कहना है कि आत्महत्या जानबूझकर खुद से की जाने वाली कोशिश है। ज्यादातर किशोर और किशोरियां तनाव में आकर जान देते हैं। ऐसे बच्चों में सही और गलत जानकारी का अभाव रहता है। वे भावना और विचारों में संतुलन नहीं रख पाते हैं। डॉ. नेहा शर्मा का मानना है कि नाबालिगों के अंदर तनाव ज्यादा तेजी से आता है। पूछताछ से पता चला है कि दोस्ती या अन्य संबंधों के टूटने और पढ़ाई के बोझ के कारण अधिकतर बच्चे तनावग्रस्त हुए हैं। वे उतावलेपन में आत्महत्या का कदम उठाते हैं।
ऐसे होती है बच्चों की पहचान
तनाव ग्रस्त बच्चे नकारात्मक बातें करने लगते हैं। भावना में बहकर रोने लगते हैं। ऐसे बच्चों के अंदर असुरक्षा की भावना घर कर जाती है। आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है। किसी काम में मन नहीं लगता है। नींद नहीं आती है और खाने की दिनचर्या में परिवर्तन आ जाता है। बगैर विषय बच्चे रोने लगते हैं। बड़ी बड़ी बातें करते हैं। पढ़ाई भी नहीं करते हैं।
बच्चों में अनुशासनहीनता को न करें नजरअंदाज
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. मनोज त्रिवेदी ने बताया कि अगर बच्चा जल्द क्रोधित हो जाता है। उसके स्वभाव को नियंत्रित करना आसान नहीं है। वह ध्यान नहीं देता है, उसमें अनुशासन की कमी है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे बच्चे कई बार आवेश में आकर कोई भी कदम उठा सकते हैं। वे अपना या किसी दूसरे का नुकसान कर सकते हैं। उनकी काउंसलिंग करानी चाहिए। अगर उससे भी स्थिति सही न हो तो साइकोथैरेपी और दवाई के साथ इलाज किया जाता है।
-अभिभावकों को बच्चों के अंदर का तनाव दूर करने के लिए भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिए।
- नाबालिगों से हर मुद्दे पर बातचीत करनी चाहिए।
-बच्चे से पूछकर उसकी शोक पर ध्यान रखना चाहिए।
-संभव हो तो मनोचिकित्सक की राय लेनी चाहिए ताकि बच्चों को सही ज्ञान कराया जा सके।
-मनोवैज्ञानिक बच्चों की दिनचर्या को ठीक करने और जिंदगी की सच्चाई से अवगत कराते हैं।
- बच्चों को बताया जाना चाहिए कि जीवन में जितना मिला है। उसे खुशी से स्वीकार करें।