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उत्तराखंडी संस्कृति में रच-बस गया मुस्लिम परिवार, बोलते हैं कुमाऊंनी

Mon, 21 Nov 2016 11:21 AM IST
महेंद्र जंगपांगी/ अमर उजाला, थल (पिथौरागढ़)
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25 बरस पहले यूपी के बिजनौर से थल आकर अपना छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू करने वाले मोहम्मद इस्माइल का परिवार आज कुमाऊंनी संस्कृति में रच बस गया है। बेशक कुमाऊं के मूल निवासी कुमाऊंनी बोलने में संकोच करते हों, लेकिन इस्माइल के परिवार के लोग ठेठ (फर्राटेदार) कुमाऊंनी बोलते हैं।
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यही नहीं, उन्हें कुमाऊं की सभी रीति-रिवाजों की जानकारी है। इस्माइल के सात बच्चे हैं, जिनमें पांचवें नंबर की बेटी अफसाना (19) ने तो अपनी पेंटिंग्स में कुमाऊं की संस्कृति को सामने लाने का प्रयास किया है। वह यह भलीभांति जानती है कि किस कर्मकांड या त्यौहार में किस तरह का ऐपण बनाया जाता है। वर चौकी, ज्यूंति और दिवाली के दिन बनने वाली महालक्ष्मी की चौकी वह आसानी से बना लेती है। यहां पूजे जाने वाले देवी-देवताओं की कई पेंटिंग्स भी उसने तैयार की है।

अफसाना ने बताया कि जब वह कक्षा तीन में पढ़ती थी, तभी से पेंटिंग्स बनाने का प्रयास किया। कक्षा आठ तक ही उनका आर्ट विषय था। उसके बाद उसने घर पर ही अभ्यास कर, किताबों में देखकर पेंटिंग्स बनानी शुरू की। वह पेंटिंग्स बनाने में रंगों और पेंसिल का प्रयोग करती है। अफसाना को एक बार विद्यालय से पेंटिंग में पुरस्कार मिल चुका है।
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हाईस्कूल-इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने वाली अफसाना इस समय प्राइवेट से बीए कर रही है। उसने बताया कि कुमाऊं की संस्कृति में पेंटिंग्स बनाने के लिए कई विषय मिल जाते हैं। पहाड़ में पूजे जाने वाले देवी-देवता, यहां की प्रकृति, संस्कृति, जनजीवन सभी विषयों में पेंटिंग तैयार हो जाती है। वह कहती हैं कि अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाएगी और आर्ट गैलरी तैयार करेगी। नए बच्चे जो पेंटिंग सीखना चाहते हैं उनको भी वह सिखाने के लिए तैयार रहती है।

अफसाना ने बताया कि वह पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बनना चाहती है। इसके लिए भी वह तैयारी कर रही हैं, लेकिन पढ़ाई के अतिरिक्त जितना समय मिलता है, उसमें वह पेंटिंग तैयार कर लेती है।
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