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उत्तराखंड बनने के बाद 32 लाख ने छोड़ा पहाड़

Mon, 25 Jan 2016 10:01 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, मुंबई
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उत्तराखंड राज्य नौ नवंबर 2000 को बना तब से लेकर अब तक 32 लाख लोगों ने राज्य से पलायन किया है।
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अब भी वक्त है इसे रोका जाए, वर्ना आगे इस विकराल समस्या से निपटना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा हो जाएगा। यह विचार मुंबई कौथिग 2016 में उत्तराखंड से तेजी से हो रहे पलायन और उजड़ते गांवों की दशा पर आयोजित गोष्ठी में समाजसेवी संस्था चिंतन के संयोजक रतन सिंह असवाल ने व्यक्त किए।

इस दौरान वक्ताओं ने राज्य सरकार और लोगों से आह्वान किया गया कि गांव की सुध ली जाए और अब भी समय है कि पहाड़ को बचाया जाए। वहीं शाम को मुंबई कौथिग में पलायन पर चिंतन संस्था की ओर से एक नृत्य नाटिका आयोजित की गई, जिसमें लक्ष्मी रावत ने अपनी प्रस्तुति से सबको इस दर्द का अहसास कराया।
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प्रारंभ में चिंतन के संयोजक रतन सिंह असवाल ने कहा कि उत्तराखंड राज्य की जो कल्पना की गई थी और जिन उद्देश्यों को लेकर हम उत्तर प्रदेश से अलग हुए थे, राज्य बनने के बाद सभी सरकारें उन उद्देश्यों से भटक गई हैं, चाहे वो भाजपा हो या कांग्रेस।

रतन सिंह ने पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन देकर यह बताने की कोशिश की कि उत्तराखंड पलायन के चलते किन हालात से जूझ रहा है। पलायन के आंकड़ों में उन्होंने पहाड़ से विकासनगर, देहरादून और हल्द्वानी गए लोगों को भी शामिल किया। अखिलेश डिमरी ने कहा कि पहले रोजगार के लिए पलायन होता था, अब शिक्षा और बेहतर जिंदगी के लिए पलायन हो रहा है।

सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बड़े बड़े दावे करती है, लेकिन उत्तराखंड की 78 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है। पत्रकार अनुपम त्रिवेदी, उद्यमी मोहन काला ने कहा कि पहाड़ पर रोजगार के साधन के साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर बढ़ाया जाए ताकि पलायन रुके।

समाजसेवी चंद्र सिंह केंतुरा और डा. विनोद बछेती ने कहा कि सरकार के भरोसे बैठने के बजाए जो लोग सक्षम हैं वे गांव के विकास के लिए आगे आएं। संस्कृति कर्मी लक्ष्मी रावत ने कहा कि पहाड़ों को महिलाओं ने आबाद रखा है, लेकिन महिलाएं ही उपेक्षित हैं।
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गोष्ठी में उत्तराखंड के प्रवासियों के अलावा देश भर से उत्तराखंड समाज के राजनीति, समाज सेवा, उद्यम, खेल, संस्कृति, फिल्म और पत्रकारिता से जुड़े लोग शामिल हुए। इस अवसर पर पलायन एक चिंतन वेबसाइट का लोकार्पण किया गया।
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