हिस्सेदारी का कानूनी हक, एक पाई भी नहीं मिली
टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड में केंद्र की 75 और यूपी की 25 फीसदी हिस्सेदारी वाला संयुक्त उपक्रम है। प्रदेश सरकार का तर्क है कि उत्तरप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 47(3) के अनुसार, जिस राज्य में जो परिसंपत्ति होगी, उस पर उस राज्य का भी हक होगा। उत्तरप्रदेश से विभाजन की तिथि तक कंपनी में किए गए पूंजीगत निवेश के आधार पर इसे उत्तराखंड को हस्तांतरित होना चाहिए, क्योंकि इसका मुख्यालय उत्तराखंड में है, लेकिन परियोजना से राज्य को एक पाई भी नहीं मिली है।
टीएचडीसी की 10 परियोजनाएं
टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड को राज्य में 10 जल विद्युत परियोजनाएं आवंटित हैं। इनमें से दो परियोजनाएं टिहरी बांध और कोटेश्वर में बिजली उत्पादन कर रही हैं।
70 फीसदी परियोजनाएं राज्य में
अपनी हिस्सेदारी के पक्ष में राज्य सरकार का तर्क है कि टीएचडीसी की 70 फीसदी परियोजनाएं राज्य में स्थापित हैं। इनसे पैदा होने वाली पुनर्वास, कानून व्यवस्था, सामाजिक व पर्यावरणीय संबंधी चुनौतियों का सामना उत्तराखंड राज्य को ही करना पड़ता है, लेकिन बदले में उसे कुछ नहीं मिल रहा।
सीएम धामी पीएम से कर चुके अनुरोध
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी टीएचडीसी में हिस्सेदारी का मसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उठा चुके हैं। पीएम को सौंपे पत्र में उन्होंने वर्ष 2012 में तत्कालीन अटॉर्नी जनरल के उस परामर्श का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि टीएचडीसी की परिसंपत्ति में उत्तराखंड का हक है।
ये भी पढ़ें...दून की चाट गली में रहें सावधान: अपनी बातों में फंसाकर ऐसे शिकार बनाते हैं शातिर, ठगी के हैरान करने वाले हथकंडे
प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा दी है। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के साथ अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी व अन्य कोर्ट में उत्तराखंड के पक्ष में पैरवी करेंगे। यदि फैसला उत्तराखंड के पक्ष में आता है तो इससे राज्य को सालाना 2000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान है।
- आर मीनाक्षी सुंदरम, सचिव, ऊर्जा