बेसहारा बच्चों और बड़ों के लिए वह मां नहीं भगवान हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं राज्य महिला आयोग की सचिव रमिंद्री मंद्रवाल की। जिन्होंने बच्चों की परवरिश के लिए खुद शादी नहीं की।
अनाथ आश्रम को ही अपना घर बना लिया। वर्ष 2007 में देहरादून के बद्रीपुर के पास उन्होंने ‘अपना घर’ आश्रम बनाया। जिसमें अब तक 154 बच्चों और बड़ों को सहारा दिया जा चुका है।
यहां सरकार और अन्य संस्थाओं के जरिये भेजे गए बच्चे और बड़ों रखा जाता है। आज झारखंड, बंगाल, उड़ीसा समेत देश के विभिन्न राज्यों के करीब 43 बच्चे व बड़े यहां रहते हैं।
11 लड़के-लड़कियों का करा चुकी विवाह
शादी
रमिंद्री जैसे ही अपना घर पहुंचती हैं, बच्चो मां-मां कहकर उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं। वह भी उन्हें जमकर दुलार करती हैं। बताती हैं कि उनके यहां हर धर्म के बच्चे रहते हैं। हर त्योहार मनाया जाता है।
नर्सिंग की पढ़ाई कर हरिद्वार में कार्य करने वाली किरण बताती हैं कि आज वह जिस मुकाम पर हैं, उसमें उनकी मां (रमिंद्री) का अहम योगदान है। जिनके मार्गदर्शन और प्यार की बदौलत वह आज अपने पैरों पर खड़ी हैं।
संगीता, यामिनी, किंजल, काजल, नंदनी कहती हैं कि एक समय वह था, जब उन्हें लगने लगा था कि जीवन में कुछ नहीं है। ऐसे में रमिंद्री उम्मीद की रोशनी बनकर आई और उनके जीवन में प्रकाश भर दिया। रमिंद्री बताती हैं कि उनकी यही दुनिया है। यही कारण है कि उन्होंने विवाह नहीं किया।
मंद्रवाल बताती हैं कि अपना घर में रहने वाले 11 लड़के-लड़कियों का विवाह हो चुका है। जो लड़कियां हैं, वह शादी के बाद भी यहां आती हैं। हम भी उनके यहां आयोजन होने पर जाते हैं। काफी अच्छा लगता है।