उत्तराखंड के पौड़ी जिले के गगवाड़स्यूं पट्टी में लगने वाले सदियों पुराने मोरी मेला रविवार को धूमधाम से संपन्न हो गया। अंतिम दिन सुमेरूपुर के जंगल में चीड़ के दो बड़े पेड़ों को जड़ से उखाड़ने की अनूठी परंपरा को देखने के लिए हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
आसपास के गांवों के हजारों लोग इस परंपरा के निर्वहन का गवाह बने। परंपरा के अनुसार दोनों पेड़ों को बिना जमीन में गिराए सैकड़ों लोग तमलाग गांव लाए। गांव में कई घंटे तक पांडव नृत्य के बाद छह महीने से चल रहा मेला संपन्न हो गया।
मेले के अंतिम दिन रविवार को सुबह से ही तमलाग गांव में लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। पूजा अर्चना के बाद करीब आठ बजे पांडवों की जननी कुंती का मायका माने जाने वाले कुंडी गांव और ससुराल तमलाग गांव के लोगों ने ध्वज, ढोल-दमाऊ और देवी देवताओं के जयकारों के साथ सुमेरूपुर के लिए प्रस्थान किया।
चीड़ का पेड़ उखाड़कर निभाई अनोखी परंपरा
करीब दस बजे दोनों गांवों के लोग मोरी के मंदिर पहुंचे और दर्शन किए। इसके बाद शनिवार को न्योते चीड़ के पेड़ों के पास पहुंचे। पहले तमलाग गांव के लोगों ने पेड़ की पूजा अर्चना की। तमलाग गांव के हनुमान के पश्वा शिव दयाल और उनके साथ दो अन्य लोग पेड़ पर चढ़े।
उन्होंने पेड़ को तेजी के साथ हिलाना शुरू कर दिया। दर्जनों लोगों ने पेड़ को जड़ हिलाने, बरछे व अन्य औजारों से उसकी जड़े साफ करनी शुरू कर दी।
इसके 15 मिनट बाद कुंडी गांव के लोग इससे पचास मीटर दूर दूसरे पेड़ के पास पहुंचे। पूजा अर्चना के बाद गांव कुंडी गांव के हनुमान के पश्वा भूपाल सिंह और दो अन्य लोग भी पेड़ में चढ़े। उन्होंने पेड़ को हिलाना शुरू कर दिया।
दोनों पेड़ों को जड़ से उखाड़े जाने का यह दृश्य कौतूहल भरा रहा। इस दौरान ढोल दमाऊ की थाप, देवी देवताओं के जयकारों से पूरा सुमेरूपुर गूंज उठा। दोनों पेड़ों को ग्रामीण तमलाग गांव लाए।
तमलाग गांव के पेड़ को भैरवनाथ के मंदिर में व कुंडी गांव के पेड़ को नागराजा के मंदिर में ले जाया गया। तमलाग गांव में कई घंटे तक पांडव नृत्य हुआ। गैंडे के रूप में खाढू (भेड़) को गांव के पास के खेतों में छोड़ने के बाद मेला समाप्त हो गया।
20 मिनट में उखाड़ दिया था पेड़
करीब चालीस फीट ऊंचे चीड़ के पेड़ों को उखाड़ने के दृश्य ने वहां लोगों को पलक झपकाने तक मौका नहीं दिया। पहला पेड़ बीस मिनट में ही जड़ से उखाड़ दिया था। यह देखकर लोग आश्चर्य में पड़ गए।
तमलाग गांव के लोगों ने ठीक दस बजकर बीस मिनट पर पेड़ उखाड़ने की प्रक्रिया शुरू की। इसके ठीक पंद्रह मिनट बाद कुंडी गांव के लोगों ने पेड़ उखाड़ना शुरू कर दिया। इस बीच पांच मिनट ऐसे थे जब दोनों पेड़ों को उखाड़ने की प्रक्रिया एक साथ चली।
20 मिनट बाद दस बजकर चालीस मिनट पर तमलाग गांव के लोगों ने अपने पेड़ को जड़ से उखाड़ा। कुंडी गांव का पेड़ 11.30 बजे पेड़ को पूरी तरह उखाड़ पाए। इन लोगों को पेड़े उखाड़ने में करीब 55 मिनट लगे।
कुंडी गांव का पेड़ उखड़ने तक तमलाग गांव के लोग पेड़ को अपने कंधों में रखकर मौके पर ही खड़े रहे। इसके बाद दोनों पेड़ों को एक साथ गांव तक पहुंचाया गया।
पांडवों की याद में होता है मोरी मेला
क्षेत्रवासियों के अनुसार आज से पांच हजार साल पहले जब पांडव ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान शिव की खोज में निकले थे। इस दौरान अपना कुछ समय उन्होंने गढ़वाल में बीताया।
मान्यता है कि तब वह कुछ समय इस क्षेत्र में भी रहे। इस क्षेत्र के लोगों के व्यवहार ने पांडवों को काफी प्रभावित किया। जिससे पांडवों की जननी कुंती को गवाड़स्यूं पट्टी के तमलाग गांव अपना ससुराल जैसा और कुंडी गांव अपना मायका जैसा लगा।
तब से क्षेत्र के लोग हर 12 साल में पांडवों की याद में मोरी मेले का आयोजन करते हैं। मेला समिति के चंद्र मोहन नैथानी बताते हैं कि इस मेले को लेकर पांडवों पर आधारित कई कहानियां जुड़ी हैं।
पेड़ उखाड़ना मानते हैं पांडवों की जीत
मेला समिति के महासचिव मनोहर सिंह नेगी, चंद्र मोहन नैथानी आदि बताते है कि मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र समी पेड़ के नीछे छिपाकर रखे थे जिसे महाभारत युद्ध के समय भीमसेना द्वारा उखाड़ा गया है।
उनका कहना है कि यहां चीड़ के पेड़ को समी के पेड़ का प्रतिरूप माना जाता है जिसे पांडवों की कौरवों पर जीत के प्रतिरूप में देखा जाता है।
पहले पश्वा अकेले उखाड़ते थे पेड़
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि प्राचीन समय में चीड़ के पेड़ों को हनुमान और नारायण का पश्वा अकेले ही उखाड़ता था। लेकिन अब पेड़ पर पहले हनुमान चढ़ता है।
उसके पीछे दो-तीन अन्य लोग चढ़ते हैं इसके बाद बहुत सारे लोग पेड़ को उखाड़ने का काम करते हैं।