पिछले छह सालों में हिमालय के पर्यावरण में आए बदलाव ने उत्तराखंड में रहना खतरनाक हो रहा है। प्रदेश के भीतर बादल फटने की घटनाएं 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ गई हैं। प्रदेश के गढ़वाल मंडल में कुमाऊं की तुलना में बादल अधिक फट रहे हैं।
विज्ञापन
ताजा घटना में सोमवार शाम करीब चार बजे पौड़ी के मरोड़ा गांव में बादल फट गया। इससे पहले पौड़ी में ही मरखोला गांव में शनिवार शाम बादल फटा था। जिसमें सात लोग जिंदा दफन हो गए थे।
केंद्र सरकार ने हिमालयी क्षेत्र (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर) में बादल फटने (क्लाउड बर्स्ट) की घटनाएं बढ़ने की रिपोर्ट वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान से मांगी थी।
विज्ञापन
50 फीसदी ज्यादा फट रहे उत्तराखंड में बादल
cloud burst
- फोटो : AmarUjala
पीएमओ को भेजी गई रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2010 के बाद बादल फटने की घटनाएं अधिक होने लगी हैं। इससे पहले हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की अधिक घटनाएं होती थीं, लेकिन अब उत्तराखंड में अधिक हो रही हैं।
इन छह सालों में मानसून की तेजी (इंटेंसिटी) भी 60 से 70 फीसदी बढ़ गई है। इससे मानसून के दौरान बारिश में औसत 50 फीसदी से ज्यादा वृद्धि हुई है।
बादल फटने की घटनाओं का समय जून के आखिरी सप्ताह से सितंबर के बीच है, लेकिन सबसे अधिक घटनाएं जुलाई और अगस्त के बीच होती हैं। बादल फटने की अधिकता समुद्र तल से दो हजार मीटर की ऊंचाई पर अधिक है।
घाटी क्षेत्र में सबसे ज्यादा फटते हैं बादल, ये है वजह
बादल फटने के बाद आए मलबे में घर।
- फोटो : फाइल फोटो
विज्ञानियों का कहना है कि ऐसा जलवायु परिवर्तन और मानसून के बदले मिजाज की वजह से हो रहा है। दोनों मानसून के टकराने से लो प्रेशर जोन बनते हैं, जिससे बादल फट जाते हैं। घाटियों में सबसे अधिक घटनाएं होती हैं।
पीएमओ को भेजी गई रिपोर्ट में नदियों के आसपास आवासीय क्षेत्रों में एहतियात बरते जाने के लिए भी कहा गया है, ताकि बादल फटने की घटनाओं से होने वाली क्षति को न्यूनतम किया जा सके।
बादल फटने की घटनाओं के संबंध में पीएमओ को रिपोर्ट भेज दी गई है। इसके साथ ही गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के स्थानों का और बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, मानसून की चरम स्थिति के अलावा स्थानीय स्थितियों का भी अध्ययन किया जाएगा।
-डॉ. एके गुप्ता, निदेशक, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान
जब किसी एक स्थान पर एक घंटे के अंदर 100 मिलीमीटर से अधिक बारिश हो जाए तो इसे बादल फटना कहते हैं।
इंडियन मानसून और वेस्टरलीज में टकराहट
इंडियन मानसून और पश्चिम की तरफ से आने वाली वेस्टरलीज हवाओं के आपस में टकराने से मानसून की तेजी कई गुना बढ़ जाती है। इससे बारिश बहुत तेज होती है। लो प्रेशर जोन बन जाते हैं, जिससे एक स्थान पर इकट्ठे अधिक बारिश हो जाती है। वर्ष 2013 की आपदा के दौरान भी दोनों मानसून टकराए थे, जिससे अतिवृष्टि हुई।
ऐसे करें बचाव
-ऊंचे स्थानों पर घर बनाएं
-नदी के दायरे के अंदर और किनारे घर न बनाएं
-गदेरों के पास भी न रहें
-स्लोप पर न बसें, अधिक बारिश से भूस्खलन का खतरा रहता है