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तो क्या आर्थिक 'संकट' में फंसने वाला है उत्तराखंड!

Fri, 04 Sep 2015 01:06 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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साल 2018 तक उत्तराखंड का कर्ज 46 हजार करोड़ से ज्यादा हो जाएगा, अर्थ एवं संख्या निदेशालय की ओर से हाल ही में की गई आर्थिक समीक्षा में चिंतित करने वाला यह तथ्य सामने आया है।
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गौरतलब है कि राज्य गठन के समय यह कर्ज केवल चार हजार करोड़ रुपए का था और उस समय का सवा चार सौ करोड़ का राजकोषीय घाटा भी 2017-18 में करीब छह हजार करोड़ हो जाएगा। प्रदेश में कर्ज के मर्ज पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है, बावजूद इसके प्रदेश के राजकोषीय घाटे और कर्ज की रफ्तार पर फिलहाल कोई ब्रेक लगता नहीं दिख रहा है।

हाल यह है कि विधानसभा के चुनाव के तुंरत बाद के वर्ष में प्रदेश का कर्ज 46 हजार करोड़ रुपए से अधिक का होगा। इस तरह से हर प्रदेशवासी के हिस्से करीब 46 हजार रुपए का कर्ज होगा। यह तब है जबकि राज्य के गठन के समय प्रदेश पर मात्र चार हजार करोड़ रुपए का ही कर्ज था।
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यही हाल राजकोषीय घाटे का है। वर्ष 2017-18 में राजकोषीय घाटा करीब 5794.49 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। राज्य गठन के समय यह घाटा मात्र 424.19 करोड़ रुपए था। राज्य गठन के बाद से ही राजकोषीय घाटे में भी लगातार इजाफा हो रहा है।

वित्त विभाग के अधिकारियों के मुताबिक कर्ज और घाटे में इजाफा तो है पर इसके साथ ही प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) भी बढ़ रहा है। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक जीडीपी और घाटे का अनुपात 2017-18 में 2.95 रहने का अनुमान है। राज्य गठन के बाद के शुरू के सालों में जीडीपी और घाटे का अनुपात करीब आठ प्रतिशत था।
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रेवेन्यू सरप्लस भी रहेगा 2017-18 में

राहत की बात यह है कि आर्थिक समीक्षा में आगे आने वाले समय में राजस्व घाटा ऋणात्मक रहने का अनुमान है। इसका मतलब यह भी हुआ कि प्रदेश सरकार को राजस्व आय के बढ़ने का अनुमान है और राजस्व व्यय पर नियंत्रण पाने की उम्मीद भी है।

हालांकि 2017-18 में राजस्व अधिभार मात्र 1678 करोड़ रहने का अनुमान है। यह तब है जबकि प्रदेश सरकार सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियों के लागू होने पर वेतन, पेंशन पर खर्च में तेजी से इजाफा होने का अनुमान भी जता रही है।

राज्य पर कर्ज
2017-18 - 46688.78
2016-17 - 40894.29
2015-16 - 35691.94
2014-15 - 31051.52

राजकोषीय घाटा
2017-18 - 5794.49
2016-17 - 5202.34
2015-16 - 4640.42
2014-15 - 4075.84

केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद लगातार कम होती जा रही है। वर्ष 2017 चुनाव का वर्ष भी है। ऐसा तो नहीं हो सकता कि पैसों की कमी बताकर हम विकास कार्य रोक दें। ऐसे में कर्ज लेना मजबूरी भी है। पर अपने संसाधन बढ़ाने और बाजार ऋण पर निर्भरता कम करने के लिए भी रास्ते तलाशे जा रहे हैं। यह बात सही है कि ऋण की अदायगी भी प्रदेश सरकार को करनी होगी। पर भविष्य के बारे में बुरा-बुरा ही क्यों सोचा जाए।
- इंदिरा हृदयेश, वित्त मंत्री
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