उत्तराखंड के चमोली जिले में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां बंदरों का आतंक न हो। घरों से बर्तन और खाने-पीने की चीजें उठाने के साथ ही बंदर लोगों पर भी झपटा मार रहे हैं। विभागीय स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिए कोई प्रयास नहीं हो पा रहे हैं।
नहीं है बंदरबाड़ा
हैरत यह है कि दो वर्ष पहले घोषित बंदरबाड़ा भी अब तक आकार नहीं ले पाया है। यह स्थिति तब है जबकि इसके लिए पैसा और भूमि भी मौजूद है। बंदरों से निजात दिलाने के लिए वन विभाग ने नंदप्रयाग के निकट बंदरबाड़ा निर्माण का प्रस्ताव शासन को भेजा था।
इसके लिए 4.5 हेक्टेयर भूमि और करीब 1 करोड़ रुपये स्वीकृत हो गए थे। टोकन मनी के तौर पर चार लाख रुपये भी मिल गए। बावजूद इसके केंद्र सरकार की आपत्ति के कारण यह योजना धरातल पर नहीं उतर पाई है।
यह थी योजना
जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से बंदरों को विशेषज्ञों की मदद से पकड़कर बंदरबाड़ा में रखा जाना था। यहां उनकी नसबंदी की जानी थी। बंदरबाड़ा में फलदार पेड़ लगने थे, ताकि बंदरों के भोजन की समस्या न हो। जानकारों की मानें तो मेनका गांधी के एनजीओ की आपत्ति पर केंद्र ने इसे अपनी स्वीकृति नहीं दी।
दो वर्ष पहले चमोली, हरिद्वार और पिथौरागढ़ में तीन बंदरबाड़े स्वीकृत किए गए थे। चमोली और पिथौरागढ़ में बनने वाले इन बंदरबाड़ों पर केंद्र सरकार ने आपत्ति लगा दी। इस संबंध में लगातार पत्राचार चल रहा है। उम्मीद है कि आगामी मार्च तक कोई निर्णय हो जाए। - एस लाल एसीएफ केदारनाथ वन प्रभाग चमोली