फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पहली बार देश के बाघों की हर क्षण निगरानी

Mon, 05 Sep 2016 10:16 AM IST
रजा शास्त्री / अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
tiger - फोटो : amar ujala
विज्ञापन
देश के 47 टाइगर रिजर्व में बाघों की अब हर क्षण निगरानी होगी। बाघों की जनसंख्या और मूवमेंट को मोबाइल पर देखा जा सकेगा। इसके साथ ही जंगलों की गश्त की स्थिति और घूमने वालों की गतिविधियों को वनाधिकारी कभी भी अपने मोबाइल पर देख सकेंगे।
विज्ञापन


भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने बाघों की सुरक्षा के लिए एम. स्ट्राइप्स प्रणाली विकसित की है। इसे देश के सभी टाइगर रिजर्व में लागू किया जा रहा है। टाइगर रिजर्व में अभी तक बाघों की जानकारी कैमरा ट्रैप्स पर ही निर्भर रही है। जहां कैमरे नहीं लगे वहां बाघों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती थी।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्र सबसे अधिक बदलाव से गुजर रहा है। यहां बाघ अपने वासस्थलों को छोड़कर हिम तेंदुओं के बर्फीले इलाकों तक पहुंच रहे हैं। बाघों का मूवमेंट पता न चल पाने का फायदा वन्य जीव तस्करों के गिरोह उठाते हैं। वासस्थलों से बाहर निकले बाघों का शिकार कर लिया जाता है।
विज्ञापन


इस समस्या के निजात के लिए भारतीय वन्य जीव संस्थान ने नया सिस्टम एम. स्ट्राइप्स तैयार किया। इसे जीपीएस मैपिंग से जोड़ दिया गया। इससे समूचे टाइगर रिजर्व की हर क्षण की जानकारी मोबाइल पर उपलब्ध रहती है। डब्ल्यूआईआई ने पहले इस प्रणाली का कान्हा, कार्बेट, बदरा और रणथम्भौर समेत पांच टाइगर रिजर्व में परीक्षण किया।

प्रणाली कामयाब होने पर अब इसे स्थायी रूप से लागू किया जा रहा। पहले चरण में इसे कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के 9 टाइगर रिजर्व में लागू किया जा चुका है। अक्तूबर से इस प्रणाली को मध्य और उत्तर भारत के टाइगर रिजर्व में लागू किया जाएगा। 

ऐसे करेगा काम
डब्ल्यूआईआई ने जो सॉफ्टवेयर बनाया है उसमें सभी टाइगर रिजर्व का मैप डाल दिया गया है। इस सॉफ्टवेयर को जीपीएस से जोड़ा गया। सॉफ्टवेयर पर कमांड देते ही संबंधित क्षेत्र कंप्यूटर और मोबाइल की स्क्रीन पर आ जाता है। सेटेलाइट वहां की तस्वीर दिखाने लगता है। मॉनीटरिंग से उन क्षेत्रों के जानवरों का मूवमेंट भी दिखने लगेगा जहां कैमरे नहीं लगे हैं। वनों में घूम रहे व्यक्तियों की गतिविधियां भी दिख जाती हैं। 

इस प्रणाली से बाघों की गतिविधियों के अलावा उनकी जनसंख्या की वास्तविक जानकारी मिलेगी। वनों में हो रही गश्त से क्या फायदा मिल रहा है? यह भी पता चलेगा। इसके साथ ही अन्य वन्य जीवों के संबंध में पता चल सकेगा।
विज्ञापन

- डा. कमर कुरैशी, सीनियर साइंटिस्ट, डब्ल्यूआईआई
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें