लड़कियों को लड़कों के साथ नहीं खेलना चाहिए, अंधेरे में घर आना-जाना अच्छा नहीं, देखो तो निकर पहनकर घूम रही है...
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न जाने कितनी बार मोनिका बिष्ट को ये तंज सुनने पड़े। बाहर तो सवालिया नजरें उठती ही थीं, घर से भी न तो समर्थन मिला, न ही आर्थिक मदद। लेकिन मोनिका ने हौसला नहीं छोड़ा।
उत्तराखंड की पहली महिला फुटबॉल कोच
जज्बा कायम रखा और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनआईएस) से प्रशिक्षित उत्तराखंड की पहली महिला फुटबॉल कोच होने का गौरव हासिल कर लिया।
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कोच बनने के बाद अखबारों में तस्वीरें छपने लगीं तो तंज करने वाले ही सम्मान देकर पलकों पर बैठाने लगे।
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अमर उजाला से बातचीत में मोनिका (24) ने बताया कि आठ साल पहले महिंद्रा ग्राउंड में लगे समर कैंप से खेल की शुरुआत की। जैंतनवाला गांव से वह हर रोज सुबह चार बजे साइकिल से ग्राउंड पहुंचती थी।
फुटबॉल में बढ़ने लगी राजनीति
तब 30 लड़कियां खेलने आती थीं, उनकी टीम भी थी। फुटबॉलर रतन थापा लड़कियों को प्रशिक्षण और वर्दी देते थे, तो विजय कैंट के खिलाड़ी जूते। धीरे-धीरे फुटबॉल में राजनीति बढ़ने लगी और अब दून में लड़कियों की एक टीम भी नहीं है।
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मोनिका ने बताया कि शुरुआत में उनको परिवार से सपोर्ट नहीं मिलता था। गांववाले उनके खेलने के खिलाफ थे ही। पॉकेट मनी से खेल का सामान खरीदकर काम चलाया और डीएवी से बीकॉम किया।
खेल छोड़ने का मन बना लिया था...
वर्ष 2012 में एक बार खेल छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन फिर प्रोफेशनल कोच बनने की ठान ली तो आगे बढ़ती गई। पटियाला से एनआईएस पास करने के बाद मोनिका यूनिसन वर्ल्ड स्कूल में कोचिंग दे रही हैं।
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बताया कि 21 अप्रैल से शुरू होने वाले गर्ल्स चैलेंज कप में उनके स्कूल की छात्राओं की दो टीमें प्रतिभाग करने वाली हैं। इन टीमों का प्रदर्शन ही उनकी परीक्षा होगी।